यह हो सकता है कि किसी को भी यह बात सुनकर हैरानी हो कि सरकारें अपने देश को अशिक्षा के अंधकार में झोंक रही है। शायद आपने यह खबर पढ़ी हो कि उत्तर प्रदेश में 2700 स्कूलों को बंद किया जा रहा है। लेकिन सरकार द्वारा इन स्कूलों को बंद किए जाने की जगह इन्हें दूसरे शब्दों में पेश किया जा रहा है। सरकार द्वारा इसे मर्ज (विलय) करना कहा जा रहा है। खास बात यह है कि यह काम सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है उत्तराखंड और यूपी सहित पूरे देश में सरकारी स्कूलों को मर्ज करने का यह काम किया जा रहा है वह भी अत्यंत व्यापक स्तर पर। उत्तराखंड में बीते कुछ सालों में 1671 स्कूलों को बंद किया जा चुका है तथा 3600 स्कूल बंदी की कगार पर खड़े हैं। केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत जो व्यवस्था की गई है वह सरकारी शिक्षा को समाप्त कर रही है। 2014—15 से लेकर 2023—24 तक देश भर में 89,441 स्कूल बंद हो चुके हैं। सरकार द्वारा इतनी बड़ी संख्या में स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मर्ज किए जाने के करण सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में 16 प्रतिशत तक की कमी आई है। तथा निजी स्कूलों में छात्र संख्या और प्रतिशत बढ़ने में 36 फीसदी का उछाल आया है। इन सरकारी स्कूलों के बंद होने के कारण आम आदमी अब तीन से पांच किलो मीटर दूर अपने बच्चों को कैसे पढ़ने भेजें एक गंभीर समस्या उसके सामने आ गई है। पहले जहां हर गांव गांव तक स्कूल खोले गए थे अब उन्हें बंद किए जाने से शिक्षा अब सबकी पहुंच में नहीं रह गई है। भले ही सरकारी स्कूलों को अस्तित्व में बनाए रखने की तमाम बातें और दावे किए जा रहे हैं तथा बच्चों को मुफ्त किताबें, बैग और ड्रेस के साथ—साथ मिड डे मील तक की व्यवस्था की जा रही हो लेकिन इसके पीछे का सच यह है कि सरकारी स्कूलों को एक सुनियोजित तरीके से समाप्त किया जा रहा है और शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है। कहीं बच्चे नहीं होने की बात कही जा रही है तो कहीं शिक्षक न होने का हवाला दिया जाता है कहीं जर्जर भवन इस तालाबंदी का कारण होता है तो कहीं कुछ और कारण गढ़ लिया जाता है। सरकार को अब शिक्षकों की भी जरूरत नहीं रही है स्कूलों के मर्ज किए जाने से पहले ही शिक्षकों की संख्या अधिक हो चुकी है। शिक्षकों की भर्तियों को लेकर जो कुछ भी हो रहा है वह भी सिर्फ एक तमाशा भर है। जो शिक्षक रिटायर हो रहे हैं उनकी जगह नए शिक्षक रखने की अब जरूरत नहीं रह गई है। सरकार ने कहा तो यह था कि शिक्षा का बजट कुल जीडीपी का 6 फीसदी किया जाएगा लेकिन किया जा रहा है मात्र 2.9 फीसदी। सबसे बड़ी समस्या उस आम आदमी के सामने है जो निजी स्कूलों का भारी भरकम खर्च उठा नहीं सकते हैं और सरकारी स्कूलों तक बच्चों को भेज नहीं पा रहे हैं। ऐसे में इन बच्चों को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित होना स्वाभाविक है और उनका अनपढ़ रहना एक मजबूरी बन गया है। ऐसी स्थिति में विकसित भारत की बात आपको कैसी लगती है यह खुद सोच कर देखिए।



