वह जमाने अब लद चुके हैं जब किसी सरकारी ओहदे पर अधिकारी और मंत्री सरकारी संसाधनों का उपयोग सिर्फ सरकारी काम काज के लिए ही करते थे और किसी भी घटना दुर्घटना की जिम्मेवारी स्वयं लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया करते थे। जैसे सन 1956 में तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दे दिया था। उनके कार्यकाल में पहली बड़ी रेल दुर्घटना महमूद नगर में हुई जिसमें 112 लोगों की जान चली गई थी तब लाल बहादुर शास्त्री ने इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। तब जवाहरलाल नेहरू ने उनका यह इस्तीफा यह कहते हुए मंजूर कर लिया गया था कि पद पर बैठे लोगों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास होना तो जरूरी है ही साथ ही हमें इसकी नजीर भी पेश करनी होगी इसलिए उनका इस्तीफा स्वीकार है। लेकिन शायद अब अपनी नैतिक जिम्मेदारी और ईमानदारी का एहसास हमारे किसी नेता अथवा अधिकारी को नहीं रहा है। यही कारण है कि आज राजनीति और ब्यूरोक्रेसी से नैतिकता और जिम्मेवारी जैसे शब्दों का लोप हो चुका है। बीते दो दिन पूर्व अहमदाबाद में हुए एक बड़े हादसे में लगभग ढाई सौ लोगों की मौत हो गई तथा 50 के आसपास लोग जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। नेताओं द्वारा डिजिटल के इस युग में एक्स पर शोक संवेदना जताने वालों की बाढ़ आई हुई है। ऐसा लगता है कि यह सब घड़ियाली आंसू ही बहा रहे हैं या फिर इसलिए शोक संवेदनाएं दे रहे हैं कि कल कोई उनसे यह न कहे कि उन्हें मरने वालों से कुछ लेना—देना नहीं है उन्होंने दो शब्द संवेदना के भी नहीं कहे। इस घटना को लेकर बीते कल विपक्षी दलों के नेताओं के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं जो प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री और उड्डयन मंत्री से इस्तीफा मांग रहे हैं। भले ही इस्तीफे की मांग करने वाले यह नेता भी अपनी राजनीति चमकाने के लिए ही जिम्मेदार पदों पर बैठे इन जिम्मेवार लोगों से इस्तीफे की मांग कर रहे हों लेकिन अहम सवाल यह है कि देश भर में होने वाली तमाम हृदय विदारक घटनाओं पर देशवासियों का खून खौले या उन्हें गुस्सा आए हमारे नेताओं और अधिकारियों को कुछ क्यों नहीं होता है। क्या उसके चाल चरित्र और जीवन से नैतिकता जैसी चीज बिल्कुल समाप्त हो चुकी है? अभी पहलगाम में जो आतंकी हमला हुआ तथा इससे पूर्व पुलवामा में जो कुछ भी हुआ था वह कितना दुखद था इसका एहसास एक आदमी को हिला कर रख देता है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को इसका रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा अगर पड़ा होता तो सिंदूर पर सियासत नहीं हो रही होती। देश का एक राज्य मणिपुर जहां से मानवता को शर्मसार करने वाली तमाम तस्वीरें आई लेकिन किसी को भी इन्हें देखकर शर्म नहीं आई। अगर आई होती तो किसी न किसी ने तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी ली होती और अपने पद से इस्तीफा देने का साहस दिखाया होता। यह घटनाएं तो महज एक बानगी भर है आये दिन देश के किसी भी हिस्से से ऐसी घटना दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती हैं। लेकिन देश में जो कुछ चल रहा है या हो रहा है उसे लेकर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज जो हुआ कल भुला दिया जाता है और यूं ही देश रामभरोंसे चलाया जा रहा है और चलता रहेगा।




