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भीषण आग की चपेट में हैं उत्तरकाशी के जंगल

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  • लोकेंद्र सिंह बिष्ट


उत्तरकाशी। समूची उत्तरकाशी पिछले आठ दिनों से जंगलों की भीषण आग के धुएं की धुंध में है। जंगलों की भीषण आग आज भी यक्ष प्रश्न बनकर मुहँ बाए खड़ी है समाज और सरकार के आगे। आखिर कौन बुझाए इस आग को ये आज भी यक्ष प्रश्न है।
आज बात करते हैं उत्तरकाशी के साथ साथ उत्तराखंड के जलते जंगलों की और आपको लिए चलते हैं भीषण आग से जल रहे उत्तरकाशी के जंगलों में। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग थमने का नाम नहीं ले रही है। उत्तराखंड के कुल क्षेत्रफल 54834 वर्ग किलोमीटर में से 34434 वर्ग किलोमीटर हिस्से में वन क्षेत्र है। उत्तरकाशी में 88 प्रतिशत क्षेत्रफल में जंगल क्षेत्र है। किसी भी देश मे आदर्श पर्यावरण के लिए 33 प्रतिशत भूभाग में जंगल होने चाहिय।
देश मे 1952 में पहली बार जब अपने देश की वननीति बनी तब देश मे कुल 23 प्रतिशत वनक्षेत्र ही थे जो अब घटकर मात्र 11 प्रतिशत ही बच गए हैं। अगर जंगलों की आग इसी तरह प्रतिवर्ष यों ही भीषण रूप लेती रहे तो बचे खुचे जंगलों को समाप्त होने में समय नहीं लगेगा।
इधर आजकल शीतकाल में भी उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने अति विकराल रूप धारण कर लिया है। उत्तरकाशी के जंगलों व जिला मुख्यालय से लगे पर्वतों पहाड़ों पर लगी भीषण आग की लपटें तो मानों आसमान को छूने को लालायित हैं। उत्तरकाशी जिले का वन महकमा कहीं चैन की नींद सो रहे हैं।


समूचे उत्तराखंड में इस सीजन में आग की लगभग 1000 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। करोड़ों की वन उपज व हरियाली नष्ट हो चुकी हैं। वन्य जीव जंतुओं के लिए जंगलों की आग एक भयंकर आपदा से कम नहीं। लेकिन लगता है कि उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग अब वनविभाग के लिए चिंता का विषय नहीं रह गया है। उत्तराखंड के जंगलों का आग से जलना अब नियति बन चुका है। जिले—जिले, शहर—शहर, जंगल— जंगल से आग पसर कर समूचे गढ़वाल व कुमायूं मंडल को अपने आगोश में ले चुकी है। समूचा उत्तराखंड धुएं की आगोश में हैं। वनविभाग के आग बुझाने के तमाम दावे जंगलों की भीषण आग के आगे बौने साबित हो रहे हैं। जंगलों की आग के लिए आखिर जिम्मेदार कौन हैं? और जंगलों की आग आखिर बुझाए कौन? ये दो सवाल यक्षप्रश्न की तरह आज से नहीं दसकों से अनुत्तरित हैं। आखिर जंगल में आग लगाता कौन है?
आज से 30—40 साल पहले के जमाने में तो जंगल मे आग लगते ही ग्रामीण ही सबसे पहले आग बुझाने आते थे, क्योंकि उस जमाने गांव की समूची आर्थिकी जंगलों पर ही निर्भर थी। जंगलों से घास, लकड़ी, जलाऊ, इमारती, खेती बाड़ी, खेत खलियान, हवा, पानी, सिंचाई के लिए, पीने के लिए, पशुओं के लिये,,चारा पत्तियों से लेकर कृषि से संबंधित हल तागड, टोकरी से लेकर बोझ उठाने के लिए रिंगाल, मकान के लिए पत्थर गारे, मिटृी, मकान की छत के लिए पटाल से लेकर कड़ी तखते, लेपने पोतने के लिए मिटृी से लेकर लाल मिटृी, कमेडू, खाने के लिए जँगली फल फूल सभी कुछ तो जंगलों से ही मिलता था, वो भी निशुल्क! शायद इसी लाभ के चलते ग्रामीण ही सबसे पहले जंगल की आग बुझाने आते थे।
यह भी जानना जरूरी है कि जंगलाें की भीषण आग में प्रतिवर्ष करोड़ों की वन संपदा तो खाक होती ही है, लेकिन अमूल्य दिव्य दुर्लभ देव जड़ी बूटियां, हरियाली, बेजुबान वन्य जीव, पशु पक्षी इस आग की भेंट चढ जाते हैं। जिस हानि की न तो सरकारी व न गैर सरकारी स्तर पर कोई समीक्षा की जाती है। खैर अब तो जंगलों पर जंगलात वालों के अधिकार हैं। उनकी मर्जी से आप एक रिंगाल भी जंगल से काट कर नहीं ला सकते, `कलम’ बनाने के लिए। लेकिन जंगलों पर अगर आज कोई भारी है तो खनन माफिया, लक्कड़ माफिया, जड़ी बूटी माफिया, वन्य जीव तस्कर और भू माफिया। इनके लिए सब माफ है।
जंगलों को आग से बचाना है तो जनता यानी ग्रामीणों व जंगलों के बीच के आज से 50 वर्ष पुराने ट्टरिश्तों’ को फिर से जिंदा करने की आवश्यकता है। जब ग्रामीण जंगलों को जंगलात का नहीं खुद का समझने लगेंगे तो उस समय समझो कि जंगलों की आग को नियंत्रित किया जा सकता है।। ग्रामीण लोग ही जंगलों की भीषण आग को नियंत्रित करने में सबसे ज्यादा सहायक होंगे।


गौरतलब है कि अपने देश के जंगल खासकर उत्तराखंड के जंगल अप्रैल से लेकर जून तक धू धूकर जलते हैं। लेकिन इस बार तो हद हो गई है कि दिसंबर में ही उत्तराखण्ड के जंगल भीषण आग की चपेट में हैं।
अपने राज्य उत्तराखंड व देश के दूसरे जंगलों की आग हमेसा की तरह ही प्रकृति की कृपा से ही बारिश आने के बाद बुझती है। तब अपने देश के सारे के सारे उपाय, संसाधन धरे के धरे रह जाते हैं, ये अलग बात है कि जंगलों की आग के साथ वन उपज के साथ साथ करोड़ों रुपये तो स्वाहा हो ही जाते है और अधिकारियों की पौबारह बल्ले बल्ले हो जाती है। आग दुनियां के किसी भी छोर पर लगे, दुनियाँ के पर्यावरण के लिए घातक है।
इधर आजकल आग की कई घटनाएं सामने आईं हैं। लेकिन, अभी जो आग लगी है उससे तबाही का मंजर और भयावह होता जा रहा है। इस आग की वजह से समूची उत्तरकाशी धुंध के आगोश में है। कौन बुझायेगा आग जंगलों की? क्या वन्य जीव, क्या पशु पक्षी, क्या वन उपज खनिज, क्या वनस्पति, क्या वन ओषधियाँ, क्या बेशकीमती जड़ी बूटियां सब खाक हो रहीं हैं।।
आज की खबर इस कविता के साथ समाप्त करता हूं।
जंगल जले,
उत्तराखंड के जंगल जले,
कभी यहाँ जले ,
कभी जंगल वहाँ जले।
कभी रातभर जले,
कभी दिनभर जले।
कभी कई रात दिन जले,
जंगल जले।
वन विभाग के
नाक के तले जंगल जले,
तब फिर से जंगल लगे।
वनविभाग होश में आओ,
जंगलों की भीषण आग को बुझाओ।
जंगलों में आग नहीं,
पेड़ लगाओ।
जंगल हैं तो जल है,
जल है तो कल है।

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