September 9, 2026धामी के रिपोर्ट कार्ड से खिलेगा कमल या कांग्रेस बनाएगी सत्ता की राह बीजेपी के काम का हिसाब बनाम कांग्रेस की 5 साल की घेराबंदी दावों से नहीं, जनता के अनुभव से तय होगी 2027 की सरकार शासन बनाम पांच साल की विपक्षी राजनीति, जनता मांगेगी हिसाब देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की जमीन तैयार होने लगी है और इसके साथ ही सियासी मुकाबले का सबसे बड़ा सवाल भी आकार लेने लगा है कि भाजपा अपने पांच साल के शासन का हिसाब लेकर जनता के बीच जाएगी या कांग्रेस पांच साल की विपक्षी राजनीति को सत्ता की सीढ़ी बनाएगी? चुनाव में अब मुद्दों से ज्यादा यह कसौटी महत्वपूर्ण होगी कि जनता किसके दावों को अपने अनुभव के करीब पाती है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास सबसे बड़ा हथियार सरकार का रिपोर्ट कार्ड होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास परियोजनाओं, सड़क और कनेक्टिविटी, निवेश, रोजगार, महिला कल्याण, कानून-व्यवस्था और धार्मिक-आध्यात्मिक स्थलों के विकास को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रखने की तैयारी में है।भाजपा की रणनीति साफ है सरकार ने क्या किया, इसे बूथ स्तर तक पहुंचाया जाए। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा उसके अभियान की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। यदि भाजपा सरकार की योजनाओं और उनके वास्तविक लाभार्थियों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने में सफल रही तो विपक्ष के आरोपों की धार कमजोर करने में उसे मदद मिलेगी। लेकिन सत्ता के साथ जवाबदेही भी आती है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, पहाड़ों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की स्थिति, सरकारी भर्तियों और स्थानीय स्तर पर विकास की गति जैसे सवालों पर भाजपा को विपक्ष के साथ-साथ जनता के सवालों का भी सामना करना पड़ेगा।कांग्रेस की चुनौती और अवसर दोनों यहीं से शुरू होते हैं। विपक्ष के पास सरकार चलाने का पांच साल का रिकार्ड नहीं है, लेकिन उसके पास सरकार से पांच साल सवाल पूछने का रिकार्ड जरूर है। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्याओं, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की कोशिश करेगी। पार्टी का तर्क होगा कि सरकार के दावों और जमीन पर जनता के अनुभव में अंतर है। लेकिन कांग्रेस के सामने भी बड़ा सवाल है कि पांच साल विपक्ष में रहते हुए उसने जनता के बीच कितनी मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की? सिर्फ सरकार की कमियां गिनाना पर्याप्त नहीं होगा। कांग्रेस को यह भी बताना पड़ेगा कि सत्ता में आने पर वह क्या अलग करेगी। 2027 का चुनाव उसके लिए केवल भाजपा विरोध का चुनाव नहीं, बल्कि वैकल्पिक शासन माडल पेश करने की परीक्षा भी होगा।उत्तराखंड का चुनाव हमेशा केवल बड़े राजनीतिक नारों से तय नहीं होता। पहाड़ में सड़क कब पहुंची, अस्पताल में डाक्टर है या नहीं, स्कूल में शिक्षक हैं या नहीं, युवा को रोजगार मिला या नहीं और गांव से पलायन रुका या नहीं कि यह सवाल ज्यादा वजन रखते हैं। यही वजह है कि 2027 में सरकारी विज्ञापन बनाम विपक्षी आरोप की लड़ाई से आगे बढ़कर जमीन पर काम और जनता के अनुभव का मुकाबला होगा। भाजपा कहेगी कि उसने उत्तराखंड को नई दिशा दी, कांग्रेस कहेगी कि सरकार के दावे धरातल पर कमजोर हैं। जनता के सामने असली सवाल होगा कि इन दोनों दावों में सच्चाई कितनी है।राज्य की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव एक जैसा नहीं होगा। कुमाऊं और गढ़वाल, मैदान और पहाड़ तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मुद्दे अलग-अलग हैं। कहीं सड़क और रोजगार बड़ा सवाल होगा तो कहीं वन कानून, जमीन, पर्यटन, कृषि और पलायन। ऐसे में दोनों दलों को प्रदेशव्यापी नैरेटिव के साथ विधानसभा स्तर का अलग चुनावी एजेंडा तैयार करना पड़ेगा। आखिरकार 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगा। यह भाजपा के पांच साल के शासन और कांग्रेस के पांच साल के विपक्षी प्रदर्शन की संयुक्त परीक्षा भी होगा। भाजपा को बताना होगा कि उसने सत्ता में रहते हुए क्या बदला और कांग्रेस को साबित करना होगा कि वह सत्ता में आने के बाद क्या बदलेगी।यही वह मोड़ होगा जहां चुनावी भाषणों से ज्यादा जनता का अपना अनुभव निर्णायक बनेगा। सरकार अपने काम का हिसाब देगी, विपक्ष अपने संघर्ष का, लेकिन अंतिम फैसला उत्तराखंड की जनता करेगी कि उसे अगले पांच साल के लिए किसकी कहानी पर भरोसा है।