दुनिया की राजनीति में इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा कि परमाणु हथियारों से लैस एक देश, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य और यूरोप की प्रमुख सैन्य शक्तियों में शामिल फ्रांस, अंतरराष्ट्रीय संकटों के सामने कई बार ऐसा असहाय दिखाई देता है, मानो उसके पास कहने के लिए शब्द तो हैं, लेकिन मनवाने के लिए ताकत नहीं। सवाल यह नहीं कि फ्रांस कमजोर देश है। सवाल यह है कि इतनी ताकत होने के बावजूद उसकी बात का असर पहले जैसा क्यों नहीं रहा? उसकी चेतावनियां निर्णायक कार्रवाई में क्यों नहीं बदल पातीं? और जिस फ्रांस ने कभी दुनिया को अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का लोहा मनवाया था, वह आज बार-बार दूसरों की रणनीति के हिसाब से चलने को मजबूर क्यों नजर आता है? यह फ्रांस की सैन्य क्षमता से ज्यादा उसके राजनीतिक नेतृत्व, कूटनीतिक प्राथमिकताओं और बदलती वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा है। दुनिया में शक्ति का केंद्र बदल रहा है, लेकिन फ्रांस का नेतृत्व अभी भी उस प्रभाव को बचाने की जद्दोजहद में उलझा है, जिसे वह लंबे समय से अपना स्वाभाविक अधिकार मानता रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश की हैसियत उसके बयानों से नहीं, बल्कि उन बयानों के परिणामों से तय होती है। फ्रांस के पास परमाणु हथियार हैं, आधुनिक युद्धक विमान हैं, मजबूत सैन्य ढांचा है और वीटो का अधिकार भी। इसके बावजूद अनेक वैश्विक संकटों में उसकी भूमिका अक्सर बयान जारी करने, सहयोगियों को समझाने और कूटनीतिक पहल करने तक सीमित दिखाई देती है। यहां सवाल उठता है कि क्या फ्रांस अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने में हिचकता है या फिर उसकी शक्ति अब उन राजनीतिक परिणामों की गारंटी नहीं देती, जिनकी अपेक्षा उससे की जाती है? सच्चाई यह है कि आज किसी एक देश के लिए अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की दिशा अपनी मर्जी से तय करना आसान नहीं है। लेकिन यही तो नेतृत्व की असली कसौटी है। अगर कोई देश वैश्विक नेतृत्व का दावा करता है, तो उसे केवल चिंता जताने और अपील करने से आगे बढ़कर अपने उद्देश्यों के लिए ठोस रणनीति भी प्रस्तुत करनी होगी। फ्रांस की परेशानी यह है कि उसकी महत्वाकांक्षाएं कई बार उसकी वास्तविक राजनीतिक और सामरिक क्षमता से बड़ी दिखाई देती हैं। फ्रांस लंबे समय से यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की वकालत करता रहा है। उसका तर्क है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति के फैसले लेने के लिए हर बार अमेरिका की ओर नहीं देखना चाहिए। सुनने में यह विचार जितना आकर्षक है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन साबित हो रहा है। यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा संबंधी निर्भरता को उजागर किया है। अमेरिकी सैन्य क्षमता, खुफिया सहयोग और रक्षा संसाधनों के बिना यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था की सीमाएं सामने आती हैं। ऐसे में फ्रांस का स्वतंत्र यूरोपीय शक्ति बनने का सपना बार-बार व्यावहारिक कठिनाइयों से टकराता है। यही फ्रांस की सबसे बड़ी विडंबना है। वह अमेरिका की बराबरी में खड़े होने की बात करता है, लेकिन यूरोप को ऐसी सामूहिक ताकत में बदलने में अब तक निर्णायक सफलता नहीं मिली है, जो वाशिंगटन पर निर्भरता घटा सके। सवाल सीधा है कि अगर यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहेगा, तो उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता आखिर किस काम की? फ्रांस की वैश्विक हैसियत को सबसे गहरी चुनौती अफ्रीका में मिली है। जिन देशों में कभी फ्रांसीसी राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रभाव मजबूत था, वहां अब उस प्रभाव के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ा है। कई अफ्रीकी देशों से फ्रांसीसी सैनिकों की वापसी हुई है और पारंपरिक संबंधों पर नए सिरे से सवाल उठे हैं। इसे केवल रूस या चीन की बढ़ती सक्रियता का परिणाम बताकर फ्रांस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। इसके पीछे औपनिवेशिक अतीत की विरासत, स्थानीय संप्रभुता की आकांक्षा और पुराने शक्ति-संबंधों से असंतोष भी है। फ्रांस शायद लंबे समय तक यह मानकर चलता रहा कि ऐतिहासिक संबंध अपने आप राजनीतिक प्रभाव की गारंटी देते रहेंगे। लेकिन नई पीढ़ी का अफ्रीका पुराने समीकरणों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वहां के देश अब अपने हितों के आधार पर साझेदार चुनना चाहते हैं। फ्रांस के लिए यह महज कुछ सैन्य ठिकानों या कूटनीतिक पहुंच का नुकसान नहीं है। यह उसकी उस वैश्विक छवि को लगी चोट है, जिसके सहारे वह खुद को यूरोप से बाहर भी एक निर्णायक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। विडंबना यह है कि जिस फ्रांस ने कभी दूसरे देशों की राजनीति और भविष्य को प्रभावित करने की क्षमता पर गर्व किया, उसे अब उन्हीं देशों की बदलती आकांक्षाओं के सामने अपनी भूमिका का औचित्य साबित करना पड़ रहा है। किसी भी देश का वैश्विक प्रभाव उसके भीतर की मजबूती से पैदा होता है। जब सरकार को संसद में समर्थन जुटाने, बजट संबंधी विवादों से निपटने और जनता के असंतोष को संभालने में लगातार कठिनाइयां आती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं भी दबाव में आ जाती हैं। फ्रांस में राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक असंतोष, सार्वजनिक ऋण और बजट घाटे को लेकर विवादों ने सरकार के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी की हैं। इन परिस्थितियों में दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति पर व्यापक सहमति बनाना आसान नहीं होता। विदेश में बड़ी ताकत दिखाने से पहले देश के भीतर राजनीतिक विश्वास अर्जित करना जरूरी है। जनता अगर सरकार की आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट हो, राजनीतिक दल लगातार टकराव में हों और शासन के फैसलों पर सहमति कमजोर पड़ रही हो, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेतृत्व का दावा भी खोखला पड़ने लगता है।फ्रांस को यह समझना होगा कि वैश्विक प्रतिष्ठा केवल राष्ट्रपति के भाषणों से नहीं बचती। उसे मजबूत अर्थव्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता और नागरिकों के भरोसे की जरूरत होती है। घर की मुश्किलों से आंखें मूंदकर दुनिया को नेतृत्व का पाठ पढ़ाना किसी भी देश के लिए आसान नहीं हो सकता।फ्रांस की समस्या यह भी है कि वह एक बदलती दुनिया में अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को नए सिरे से परिभाषित करने की चुनौती का सामना कर रहा है। अब दुनिया केवल अमेरिका और यूरोप की धुरी पर नहीं घूमती। चीन की आर्थिक और तकनीकी शक्ति, रूस की सैन्य भूमिका तथा एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया के देशों की बढ़ती स्वतंत्रता ने वैश्विक राजनीति को अधिक जटिल बना दिया है। इस नई व्यवस्था में किसी देश की पुरानी प्रतिष्ठा उसे स्थायी बढ़त नहीं दिला सकती। हर साझेदारी को नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है और हर रणनीति को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप साबित करना पड़ता है। फ्रांस यदि अपनी ऐतिहासिक भूमिका को ही वर्तमान प्रभाव का प्रमाण मानता रहेगा, तो उसे बार-बार निराशा हाथ लगेगी। दुनिया बदल रही है और उसके साथ शक्ति के मानदंड भी बदल रहे हैं। अब केवल परमाणु हथियार, वीटो और औपनिवेशिक अतीत किसी देश को निर्णायक नहीं बना सकते।
फ्रांस को लाचार कहना शायद अतिशयोक्ति हो, लेकिन उसकी सीमाओं को नजरअंदाज करना भी आत्मछल होगा। वह आज भी एक बड़ी शक्ति है, मगर बड़ी शक्ति होना और दुनिया को अपनी दिशा में चलाने की क्षमता रखना अलग-अलग बातें हैं।





