Home News Posts उत्तराखंड कांग्रेस के ‘चंदा माडल’ पर भाजपा का हमला

कांग्रेस के ‘चंदा माडल’ पर भाजपा का हमला

0
67
  • भ्रष्टाचार के आरोपों से गरमाई सूबे की राजनीति
  • भाजपा का हमला और कांग्रेस के नैरेटिव का जिक्र
  • कांग्रेस की फंडिंग व्यवस्था व नेटवर्क पर उठे सवाल

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। भाजपा ने प्रदेश और देश में कांग्रेस से जुड़े सामने आ रहे कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर कांग्रेस की कार्यशैली पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता को जवाब देने के बजाय राजनीतिक सुविधा के अनुसार नैरेटिव गढ़ती रही है, जबकि उसके शासनकाल और नेताओं से जुड़े मामलों ने कथित तौर पर अलग तस्वीर सामने रखी है।
भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सहायक से कथित काले धन की बरामदगी और आरोपी पीए की ओर से कांग्रेस के लिए चंदा जुटाने संबंधी बताए जा रहे बयान को राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा बनाया है। भाजपा का कहना है कि यदि जांच में सामने आए तथ्यों और आरोपों की पुष्टि होती है तो यह महज किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था और सत्ता के दौरान बने कथित नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
भाजपा का हमला यहीं नहीं रुका। पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की राजनीति में भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही कार्यसंस्कृति का हिस्सा रहा है। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों की अंतिम सच्चाई जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगी। फिलहाल दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया है।
भाजपा की रणनीति में सबसे महत्वपूर्ण हथियार कथित कांग्रेसी चंदा माडल का मुद्दा है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी आरोपी से जुड़े बयान में राजनीतिक दल के लिए चंदा जुटाने की व्यवस्था का उल्लेख सामने आता है तो कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पार्टी के लिए धन जुटाने की प्रक्रिया क्या रही है और इसमें कौन-कौन लोग शामिल रहे हैं। राजनीतिक तौर पर यह सवाल कांग्रेस के लिए इसलिए असहज करने वाला है क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब केवल राजनीतिक प्रत्यारोप से नहीं दिया जा सकता। भाजपा अब कांग्रेस से यह पूछ रही है कि पार्टी को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता, उसके स्रोत और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों पर उसका आधिकारिक पक्ष क्या है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का नाम सामने आने से यह विवाद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है। रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे हैं और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उनकी राजनीतिक सक्रियता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में भाजपा के लिए यह मुद्दा कांग्रेस के पुराने शासनकाल और उसके नेतृत्व की कार्यशैली पर हमला करने का अवसर बन गया है। भाजपा का संदेश साफ है कि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की नैतिकता की परीक्षा अब उसके अपने नेताओं और उनसे जुड़े मामलों के संदर्भ में होनी चाहिए।
वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह इन आरोपों को केवल राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताकर खारिज करने के बजाय तथ्यों के आधार पर जवाब दे। यदि आरोप निराधार हैं तो पार्टी को जांच और दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष मजबूती से सामने रखना होगा। यही लोकतांत्रिक राजनीति में जवाबदेही की कसौटी है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है और ऐसे में भ्रष्टाचार का मुद्दा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हथियार बनेगा। भाजपा कांग्रेस के पिछले शासनकाल को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस मौजूदा सरकार के कार्यकाल, रोजगार, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भाजपा पर पलटवार करेगी।
यानी लड़ाई केवल एक कथित बरामदगी या एक आरोपी के बयान तक सीमित रहने वाली नहीं है। इसके केंद्र में बड़ा राजनीतिक सवाल है कि सत्ता और राजनीतिक चंदे के बीच संबंध कितना पारदर्शी है और राजनीतिक दल अपने आर्थिक स्रोतों के प्रति कितने जवाबदेह हैं? यही वह बिंदु है जहां भाजपा का दाल काली वाला हमला कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बनता है। हालांकि, लोकतंत्र में आरोप लगना और आरोप साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी दल को राजनीतिक लाभ के लिए जांच से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने के बजाय तथ्यों और कानून की प्रक्रिया पर भरोसा करना चाहिए।
उत्तराखंड की जनता के सामने अब असली सवाल किसी एक पार्टी की बयानबाजी से बड़ा है। जनता यह जानना चाहती है कि राजनीतिक दलों को पैसा कहां से मिलता है, कौन देता है, किसके माध्यम से पहुंचता है और चुनावी राजनीति में उसका इस्तेमाल किस तरह होता है। भाजपा यदि कांग्रेस के कथित चंदा माडल को मुद्दा बना रही है तो उसे भी राजनीतिक चंदे और अपने वित्तीय तंत्र की पारदर्शिता के सवालों पर समान कसौटी स्वीकार करनी होगी। लोकतंत्र में जवाबदेही एकतरफा नहीं हो सकती। 2027 की चुनावी लड़ाई में भ्रष्टाचार निश्चित रूप से बड़ा मुद्दा बन सकता है। लेकिन इस बार जनता केवल आरोप नहीं, सबूत, जांच और कार्रवाई का परिणाम भी देखना चाहेगी। राजनीति में किसकी दाल कितनी काली का फैसला भाषणों से नहीं, तथ्यों और जांच की निष्पक्ष परिणति से होना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here