रातभर सड़कें उबलती रहीं। बैरिकेडिंग टूटी। हजारों युवा सड़कों पर डटे रहे। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का—मुक्की हुई। आंदोलन को नया प्रतीकात्मक बल तब मिला जब प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी भी प्रदर्शन स्थल पर पहुंचीं। तस्वीरें और वीडियो रातभर सोशल मीडिया पर दौड़ते रहे। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बैरिकेड किसने तोड़े, बल्कि यह है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि युवाओं का गुस्सा पूरी रात राजधानी की सड़कों पर उफनता रहा? व्यंग्य में लोग इस आंदोलन को काकरोच जनता पार्टी कह रहे हैं। लेकिन नाम चाहे जो दिया जाए, सच्चाई यह है कि जब बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरते हैं तो उसके पीछे केवल राजनीतिक दलों की रणनीति नहीं होती, बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास भी होता है। यदि सरकार हर विरोध को केवल विपक्ष की साजिश मानकर खारिज कर देगी, तो वह असली संदेश सुनने से चूक जाएगी। उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में कई आंदोलनों का गवाह रहा है। कभी भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर युवा सड़क पर उतरे, कभी मूल निवास और भू—कानून का मुद्दा गरमाया, कभी चारधाम, कभी पर्यावरण और कभी स्थानीय अधिकारों का सवाल उठा। हर बार सरकार ने आश्वासन दिया कि समस्याओं का समाधान होगा। लेकिन यदि बार—बार युवा सड़कों पर लौट रहे हैं तो यह संकेत है कि भरोसे का संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। दिल्ली में बैरिकेडिंग टूटना किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की आदर्श तस्वीर नहीं हो सकती। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या कानून हाथ में लेना उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन उतना ही बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार ने संवाद के सारे रास्ते समय रहते खोलने का प्रयास किया? लोकतंत्र में बैरिकेड केवल लोहे के नहीं होते, संवादहीनता के भी होते हैं। जब बातचीत के दरवाजे बंद होते हैं, तब सड़कें खुल जाती हैं। युवाओं का आक्रोश केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। पहाड़ का युवा पलायन से परेशान है, सीमांत क्षेत्रों का युवा सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है, पढ़ा—लिखा युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता से निराश है। ऐसे में यदि उसके भीतर यह भावना घर कर जाए कि उसकी आवाज केवल प्रदर्शन के बाद ही सुनी जाएगी, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सरकार को यह भी समझना होगा कि सोशल मीडिया के दौर में कोई भी आंदोलन स्थानीय नहीं रहता। रातभर की घटनाएं कुछ ही मिनटों में राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाती हैं। ऐसे में प्रशासन की हर कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों का हर कदम सार्वजनिक जांच के दायरे में होता है। इसलिए संयम दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है। इस आंदोलन ने एक और प्रश्न खड़ा किया है। क्या सरकार केवल तब सक्रिय होती है जब भीड़ बैरिकेड तोड़ दे? यदि संवाद पहले शुरू हो जाए, यदि जनप्रतिनिधि समय रहते जनता के बीच पहुंचें, यदि प्रशासन शिकायतों का समाधान आंदोलन बनने से पहले कर दे, तो शायद ऐसी टकराव की स्थिति ही पैदा न हो। रातभर चला यह प्रदर्शन केवल एक रात की घटना नहीं है। यह उस बेचौनी का संकेत है जो लंबे समय से भीतर—ही—भीतर जमा होती रही है। सरकार चाहे तो इसे कानून—व्यवस्था की चुनौती मानकर अगले आंदोलन तक भूल सकती है, लेकिन यदि वह इसे जनता के मन की चेतावनी के रूप में पढ़े, तो यही घटना सुधार की शुरुआत भी बन सकती है।




