September 9, 2026स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में शहरों की रैंकिंग सामने आते ही नगर निकायों और सरकारों के लिए अपनी पीठ थपथपाने का दौर शुरू हो जाता है। कहीं बेहतर प्रदर्शन की उपलब्धि गिनाई जाती है तो कहीं पिछड़ने के कारण खोजे जाते हैं। लेकिन असली सवाल रैंकिंग का नहीं, शहर में रहने वाले नागरिक को वास्तव में कितनी साफ हवा मिल रही है, इसका है। स्वच्छ हवा अब सुविधा नहीं, जीवन की बुनियादी जरूरत है। बढ़ता यातायात, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, सड़क किनारे कूड़े का जलना, औद्योगिक गतिविधियां और हरित क्षेत्र का लगातार सिकुड़ना हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। समस्या यह है कि प्रदूषण दिखाई न देने पर भी उसका असर लगातार शरीर और पर्यावरण पर पड़ता रहता है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की सबसे बड़ी उपयोगिता तभी है, जब इसे केवल पुरस्कार और प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रतियोगिता न बनाया जाए। सर्वेक्षण से मिले आंकड़ों को शहर की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना होगा। यदि किसी शहर की रैंकिंग सुधरती है लेकिन उसके प्रमुख चौराहों पर धूल, धुआं और जाम जस के तस हैं, तो यह सफलता अधूरी है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए यह सवाल और गंभीर है। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर के तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हवा की गुणवत्ता को लेकर दीर्घकालिक नीति जरूरी है। पहाड़ों को यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि जंगल और हरियाली होने मात्र से प्रदूषण का खतरा समाप्त हो जाता है। पर्यटन, वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण और कचरा प्रबंधन की कमजोरियां यहां भी चुनौती बन रही हैं। जरूरत केवल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्रवाई की नहीं, बल्कि नगर नियोजन की पूरी सोच बदलने की है। सार्वजनिक परिवहन मजबूत हो, पैदल और साइकिल के लिए सुरक्षित रास्ते बनें, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण अनिवार्य हो, कूड़ा जलाने पर प्रभावी रोक लगे और शहरों में हरित क्षेत्र सुरक्षित किए जाएं। साथ ही वायु गुणवत्ता के आंकड़े नागरिकों के लिए आसानी से उपलब्ध और समझने योग्य होने चाहिए। सरकारों को यह भी समझना होगा कि स्वच्छ हवा का सवाल किसी एक विभाग का विषय नहीं है। नगर निकाय, परिवहन, पुलिस, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वन विभाग और शहरी विकास एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा। सड़क चौड़ी करने से पहले यह सोचना होगा कि उससे यातायात सुधरेगा या कुछ वर्षों बाद वाहनों और प्रदूषण का नया संकट खड़ा होगा। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की रैंकिंग शहरों को आईना दिखाने का काम करती है। इस आईने में केवल अपनी तस्वीर देखकर खुश होने के बजाय उन कमियों को देखना होगा, जिन्हें नागरिक रोज अपनी सांसों के साथ महसूस कर रहे हैं। आखिरकार किसी शहर की असली उपलब्धि यह नहीं कि वह सर्वेक्षण में कितने नंबर पर आया। असली सफलता तब होगी, जब बच्चे बिना प्रदूषण के डर के खेल सकें, बुजुर्ग खुली हवा में सांस ले सकें और आम नागरिक को यह महसूस हो कि उसके शहर की हवा सचमुच बेहतर हुई है। रैंकिंग बदलती रहती है, लेकिन साफ हवा की जरूरत हर दिन रहती है।