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देवभूमि में राजनीतिक आपदा

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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ धाम आकर ध्यान किया और अपनी उत्पत्ति नॉन वायलॉजिकल बताने वाले पीएम इस दशक को उत्तराखंड का दशक होने का दावा क्या कर गए राज्य के भाजपा नेताओं को तो जैसे सत्ता में बने रहने की संजीवनी बूटी ही मिल गई। उत्तराखंड के विकास को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने के दावे करना उनकी ऐसी आदत में आया कि इन नेताओं ने यह मान लिया कि इसकी आड़ में अब वह कुछ भी करते रहे वह सबको इस उत्तराखंड के विकास के दशक के पहाड़ के नीचे दबा देंगे। विकास के इस दशक के जुमले की हकीकत अब पहाड़ फोड़ कर बाहर आ रही है और खुद चींख—चींख कर बता रही है कि मंडवा झंगोरा खाएंगे उत्तराखंड बनाएंगे का नारा लगाने वाले और आंदोलन के दौरान अपने सीने पर गोलियां खाने वाले आंदोलनकारी और पहाड़ के विकास का सपना देखने वालो को सूबे के नेताओं ने इन 25 सालों में कहां लाकर खड़ा कर दिया है। राज्य गठन के बाद से ही इन नेताओं के अगल बगल चाटुकारों और दलालों का जो मकड़जाल बनना शुरू हुआ था अब वह एक ऐसा विकराल रूप ले चुका है कि जो भी इनके जाल में फंस गया वह सिर्फ अपनी आत्महत्या में ही अपनी हर समस्या का समाधान ढूंढता दिख रहा है। जितेंद्र नेगी की आत्महत्या तो एक बानगी भर है। इससे पूर्व बिल्डर सत्येंद्र साहनी ने भी इसी तरह से आत्महत्या कर ली थी जिसे आरोप बहुचर्चित गुप्ता बंधुओं पर लगाया गया था लेकिन साहनी ने आत्महत्या से पूर्व कोई वीडियो नहीं बनाई थी। तथा गुप्ता बंधुओं पर सरकार भी कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी इसलिए यह मामला नेपथ्य में चला गया और अब लोग भी इसे भूल चुके हैं। जितेंद्र नेगी ने अगर सुसाइड से पहले वीडियो नहीं बनाई होती तो लोग आज भी उस हिमांशु का नाम तक नहीं जान पाते जिस पर जितेंद्र नेगी ने अपने जीवन लीला समाप्त करने का आरोप लगाया है। उत्तराखंड में एक नहीं सैकड़ो हिमांशु सूबे के नेताओं की छत्रछाया में पल रहे हैं। जिनके पास न तो कोई पद है और न ओहदा बस वह नेताओं और अधिकारियों की नजदीकियों का दिखावा करके ही आम आदमी को चाहे जितना बड़ा झांसा देकर चाहे जितनी रकम डकार सकते हैं। ऐसा ही एक मामला पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत के भांजे राणा का भी इन दिनों सुर्खियों में है। अंकिता हत्याकांड के आरोपी पुलकित आर्य जैसे लोग न जाने कितने और होंगे जो वीवीआईपी को एक्स्ट्रा सर्विस दिलाने के धंधे में जुटे हुए हैं। हाकम से लेकर अनामिका तक ऐसे नाम की लिस्ट इतनी लंबी है न उनकी जानकारी जुटा पाना संभव है न लिस्ट बनाया जाना। अब थोड़ी सी बात उस मुद्दे पर भी कर ली जाए जो राजनीति के बिंदुओं से नहीं सीधे उन नेताओं से जुड़ी है जो आजकल खुद ही अपने कुर्ते फाड़ कर खुद को नंगा कर रहे हैं। डा. हरक सिंह ने 30 करोड़ के चंदा वसूली की पोल खोली तो पूर्व सीएम त्रिवेंद्र ने इस पर सफाई देते हुए स्वीकार किया कि यह राशि 30 करोड नहीं 27 करोड़ थी। लेकिन इसके साथ ही वह चेक से लिया गया चंदा बता कर इसमें कोई भ्रष्टाचार न होने की बात कह रहे हैं। खनन माफिया और शराब माफिया और भू माफिया से अगर आप 27 करोड़ वसूल रहे हैं तो इसके एवज में आप उन्हें क्या—क्या सुविधायें दे रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत को यह भी बताना चाहिए कि भ्रष्टाचार रोकने को वह जो लोकायुक्त लाना चाहते थे उसका क्या हुआ? हाईवे जमीन अधिग्रहण घोटाले से लेकर हरिद्वार भूमि घोटाले तक क्या कोई एक भी घोटाला राज्य में अब तक ऐसा है जिसमें शासन—प्रशासन की संलिप्तता न रही हो। त्रिवेंद्र को अब पार्टी की छवि की चिंता क्यों सता रही है। सच यह है कि सूबे के नेताओं ने ही 25 सालों में इस देवभूमि को गंभीर राजनीतिक आपदा के शिखर पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिसका कोई समाधान अब किसी के पास नहीं है।

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