Home उत्तराखंड देहरादून बकरीद पर बयानों की बाढ़

बकरीद पर बयानों की बाढ़

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ईद पर दी जाने वाली जानवरों की कुर्बानी की रवायत भले ही कितने भी साल पुरानी हो या फिर इसके पीछे धार्मिक महत्व के उदाहरण हो। लेकिन वर्तमान दौर की राजनीति में जहां हर एक बात को घुमा फिरा कर वोट की उस राजनीति से जोड़ दिया जाता है जो हिंदू—मुस्लिम के इर्द—गिर्द आकर टिक जाती है। इस बार ईद पर भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा इस बार कुछ खास गाइडलाइन जारी की गई है। खुले स्थानों पर कुर्बानी नहीं होगी, सड़क और रास्तों पर कुर्बान पशु के अवशेष नहीं डाले जाएंगे तथा नालियों में खून नहीं बहाया जाएगा। सरकार द्वारा धार्मिक स्थलों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करने तथा सार्वजनिक स्थानों पर नमाज न पढ़ने के निर्देशों का साथ गोवंश की कुर्बानी को पहले ही हराम घोषित किया हुआ है। ईद पर होने वाली इस कुर्बानी की प्रथा को लेकर तरह—तरह के समाचार दिखाए जा रहे हैं। इन भ्रामक सूचनाओं पर प्रतिबंध लगाया जाना जरूरी है लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा भी इस पर तमाम तरह की प्रतिक्रिया दी जा रही है। संत समाज के लोगों का कहना है कि जीव हत्या पाप है तथा निंदनीय है। कुछ धर्माचार्यो द्वारा मुसलमानों को बकरे की जगह केक काटकर ईद मनाने की नसीहतें दी जा रही है। वहीं कुछ नेताओं द्वारा मुसलमानों के त्योहार को क्रूर और गंदा बताया जा रहा है। खास बात यह है कि कुर्बानी या बली की यह प्रथा सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं है हिंदुओं के द्वारा भी देवी—देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कुर्बानी की प्रथाएं रही है। भले ही बदलते वक्त के साथ कुछ स्थानों पर यह कम हो गया हो या खत्म हो गया हो जहां तक हमारी धार्मिक आस्थाओं और मान्यताओं का सवाल है हमारा संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है लेकिन अन्य धर्म के लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाने का अधिकार किसी को भी नहीं देता है। दरअसल इस फसाद की जड़ में जो अहम बात है वह यही है। समाज में कुछ अराजक तत्वों द्वारा इसको लड़ने का एक हथियार या औजार बना लिया गया है। जीव हत्या पाप है तो फिर सरकार को देश में जीव हत्या पर पूर्ण पाबंदी लगा देना चाहिए। एक तरफ भारत का अरबों रुपए का वह मीट कारोबार है जिसके जरिए सरकार की मोटी कमाई होती है तथा इस कारोबार को करने वाले मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी हैं जिनमें कई नेता भी शामिल है। भारत मीट निर्यातक देशों की सूची में विश्व में तीसरे स्थान पर है। विश्व के देशों में 33 हजार करोड़ का एक्सपोर्ट भारत ही करता है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश कुल निर्यात का 50.34 फीसदी निर्यात करता है यानी की मीट का धंधा सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में ही होता है। भारत में 200 मिलियन पशुओं को हर साल काटा जाता है। जो लोग ईद पर कुर्बानी का विरोध कर रहे हैं उन्हें इस मीट कारोबार को बंद करने की मांग भी करनी चाहिए। इस मीट कारोबार की आड़ में जो हिंदू—मुस्लिम की राजनीति होती है तथा गौ रक्षा के नाम पर सांप्रदायिक टकराव के हालात बने रहते हैं वह अत्यंत ही चिंतनीय है। आगरा में नौ लोगों की गिरफ्तारी और यूपी के ही अलीगढ़ में गौ मांस की झूठी सूचना पर हंगामा करने के पीछे भी अवैध वसूली के जो नेक्सस का भंडाफोड़ हुआ है वह हिंदू समाज को शर्मशार करने वाला है। आज अगर इस तरह की घटनाओं को लेकर अगर यह कहा जा रहा है कि देश में एक संप्रदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है तो यह गलत नहीं है। हिंदूवादी संगठनों को इस मुद्दे पर चिंतन करने की जरूरत है।

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