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आसान नहीं कांग्रेस की लड़ाई

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कांग्रेस द्वारा गुजरात के अहमदाबाद में सीडब्ल्यूसी की बैठक में कांग्रेसी नेताओं द्वारा सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति को राष्ट्र के लिए बड़ा खतरा बताते हुए इस ध्रुवीकरण की राजनीति से लड़ने का संकल्प लिया गया है। तथा सरदार पटेल के वैचारिक विचार पर काम करने का फैसला लिया है। कांग्रेस नेताओं की इस चिंता को कतई भी गैरबाजिव नहीं माना जा सकता है क्योंकि विगत कुछ सालों में देश के समाज में नफरत और हिंसा का एक ऐसा माहौल तैयार हो चुका है जो देश के समाज को विखंडन की ओर धकेल रहा है। वोटो के धु्रवीकरण के लिए जाति—धर्म और क्षेत्रवाद के मुद्दे को हवा दी जा रही है और लोगों को आपस में लड़ाने की कोशिशे हो रही है। स्वतंत्रता के पहले पांच दशक तक इस देश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति सबसे अधिक प्रभावशाली रही। संविधान में इस शब्द का विशेष प्रयोग जिस वृहद विचार के साथ किया गया है वह इस देश के लोकतंत्र की मूल भावना से जुड़ा हुआ है। सर्वधर्म समभाव और सभी धर्म और जातियों के लोगों के लिए समान अवसर प्रदान करने की हिमायत करने वाले इस धर्मनिरपेक्ष शब्द के सहारे देश की राजनीति और सत्ता पर कांग्रेस काबिज रही। लेकिन धीरे—धीरे मंडल और कमंडल की राजनीति ने धर्मनिरपेक्षता के इस मिथक को तोड़ दिया और आज देश हिंदुत्व के एजेंडे तथा हिंदू राष्ट्र के घोड़े पर सवार हो चुका है। बात चाहे हम किसी भी राष्ट्र की करें मुस्लिम राष्ट्र या हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का मतलब धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों से ही किनारा कर लेना है। हिंदुस्तान में एक देश एक पहचान से लेकर एक देश एक चुनाव एक देश एक विधान जैसी तमाम पहलों को पीछे सिर्फ एक ही मकसद है और वह ध्रुवीकरण की राजनीति। भले ही कांग्रेस के नेताओं द्वारा अपनी चिंतन बैठक में धु्रवीकरण की राजनीति का मुकाबला करने की बात कही जा रही हो लेकिन क्या कांग्रेस और उसके नेताओं के लिए ऐसा कर पाना बहुत आसान होगा। खास तौर से एक ऐसे वक्त में जब भाजपा संगठनात्मक रूप से इतनी मजबूत हो चुकी है कि समाज में हर घर और व्यक्ति को अपने प्रभाव में ले चुकी है खास तौर पर देश के हिंदुओं को यह लगने लगा है कि भाजपा के अलावा अन्य कोई भी दल उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता है। इस बैठक में राहुल गांधी ने जिस बात पर चिंता जताई है कि पहले कांग्रेस को सभी वर्ग के लोगों का वोट मिलता था लेकिन धीरे—धीरे ओबीसी वर्ग कांग्रेस से दूर होता चला गया और जब तक सभी वर्ग कांग्रेस के साथ नहीं आते हैं तब तक कांग्रेस का कुछ भला नहीं हो सकता है। यह सोच भले ही सच—सही लेकिन कांग्रेस के लिए यह कर पाना बहुत जटिल काम होगा वही इससे भी ज्यादा मुश्किल है कांग्रेस के संगठन को फिर से इतना मजबूत बनाना जितना वर्तमान दौर में भाजपा का सांगठनिक ढांचा मजबूत है। कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता अब उतना आसान है नहीं जितना कांग्रेस समझ रही है।

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