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धर्म व राजनीति एक साथ कब तक?

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इन दिनों एक बार फिर हिंदू—मुस्लिम और मंदिर—मस्जिद के मुद्दों पर देश की सियासत में उफान आया हुआ है। देश के नेताओं के तीखे और भड़काऊ बयानों से यह साफ है कि स्थिति अत्यंत ही गंभीर रूप ले चुकी है। मौनी अमावस्य के दिन शकंराचार्य अविमुक्तेश्रवरा नन्द का त्रिवेणी संगम पर जाने से शासन—प्रशासन द्वारा बलपूर्वक रोके जाने जैसी खबरें यह बताने के लिए काफी है कि देश की राजनीति और देश का लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है। सालों तक मणिपुर सांप्रदायिक हिंसा की आग में जला तथा महिलाओं के साथ ऐसे शर्मनाक अपराधों को अंजाम दिया गया जिन्हें लेकर देश—विदेश तक में देश की सभ्यता और संस्कृति के साथ लोकतंत्र पर भी सवाल खड़े हुए।ं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय तक इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोले। अभी बीते साल आई लव मोहम्मद को लेकर कुमांऊ मण्डल में व्यापक हिंसा और आगजनी हुई। उत्तराखण्ड की सरकार जो कानून व्यवस्था को लेकर बड़े—बड़े दावे करती है वह भी इस दुखद घटना को रोकने में तो नाकाम रही। जो लोग देश की गंगा—जमुनी संस्कृति और सभ्यता की जड़ों और देश के लोकतंत्र की बुनियाद को खोदने का काम कर रहे हैं जिसके गंभीर परिणाम देश की आने वाली पीढियों को भोगने पड़ेंगे देश में नफरत की जो राजनीति उफान पर है तथा जिसे अपने राजनीतिक हितों के लिए साधा जा रहा है वह सत्ता में बैठे लोगों के अंदर के डर को दर्शाती है। यह कोई एक अकेला वाक्या नहीं है अभी कुछ माह पूर्व हैदराबाद से चलकर भाजपा के विधायक टी राजा उत्तराखंड के उत्तरकाशी पहुंचे। उन्होंने उत्तराखंड के लोगों को अपने यहां आने का मकसद बताते हुए साफ कहा कि वह सूबे के मुख्यमंत्री धामी से यह अपील करने आए हैं कि वह राज्य की सभी मस्जिदों और मजारों की जांच करायें और उन पर बुलडोजर की कार्यवाही करें। यह अलग बात है कि उत्तराखंड के किसी भी मीडिया प्रतिष्ठान या पत्रकार द्वारा उनसे यह सवाल नहीं पूछा गया कि जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा बुलडोजर की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई है तो वह सीएम धामी से इस तरह की मांग क्यों और कैसे कर सकते हैं? लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा ने जिस तरह से अयोध्या में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के जरिए हवा देने की कोशिश की थी और वह इस प्रयास में विफल साबित हुई थी उसके बाद यह माना जा रहा था कि अब ऐसे मुद्दों पर होने वाली राजनीति हतोत्साहित होगी लेकिन यह सोच अब गलत साबित हो चुकी है। इसके उलट सत्ता पक्ष ने अब इसे और अधिक मजबूती और जोरदार तरीके से आगे बढ़ाने के लिए कमर कस ली है। परिणाम क्या होंगे? उनके बारे में कोई कुछ भी सोचे लेकिन यह हालात देश और समाज हित में कदाचित भी नहीं ठीक हो सकते है।

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