जी हां! देश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सन 2005 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से भारत के गरीब गांव वासियों को रोजगार की गारंटी वाली जो मनरेगा योजना लाई गई थी जो ग्रामीण मजदूरों को साल में 100 दिन मजदूरी का काम देने की गारंटी देती थी और काम न दे पाने पर मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता देती थी उस योजना का वर्तमान सरकार द्वारा नाम ही नहीं बदल गया है बल्कि एक तरह से समाप्त ही करने का इंतजाम कर दिया गया है। बहुमत के दम पर केंद्र सरकार ने विपक्ष के घोर विरोध और तमाम आपत्तियों के बावजूद इस योजना का नाम अब मनरेगा की जगह जी राम जी करने का काम कर दिया गया है विपक्ष के सभी दल कई दिनों से इसके प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे तथा उन्होंने इस पर लंबी बहस भी की और इसे संसद की स्थाई समिति के पास भेजने की मांग भी की लेकिन सरकार ने विपक्ष की कोई बात नहीं सुनी नाराज विपक्ष बेल में हंगामा करता रह गया बिल का प्रस्ताव फाड़कर कृषि मंत्री शिवराज सिंह पर उछालता रहा और लोकसभा अध्यक्ष ने संसद की कार्यवाही 19 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई। देश के 12 करोड़ मजदूरों की आजीविका से जुड़ी इस सरकार की अति महत्वकांसी योजना से सिर्फ गरीबों के जीवन यापन में ही सहारा नहीं मिलता था बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले काम भी आसानी से पूरा करने में मदद मिलती थी। केंद्र सरकार द्वारा इस योजना का नाम तो सिर्फ विपक्ष को एक बहस में उलझाने के लिए किया गया है सही मायने में सरकार इस योजना को समाप्त करना चाहती है और इसके पीछे अहम कारण है सरकार की खस्ता हाल आर्थिक स्थिति। झूठ और गलत आंकड़े पेश करके सरकार भले ही डंका पीट रही हो कि भारत की अर्थव्यवस्था कुलांचें भर रही है लेकिन इसका स्याह सच यह है कि बीते 10 सालों में सरकार ने अर्थव्यवस्था को ऐसे गंभीर संकट में लाकर खड़ा कर दिया है कि उसे इससे बाहर आने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है और वह अब मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं से पल्ला झाड़ने पर आमादा है। इस योजना के तहत इस पर खर्च होने वाले धन को 90 फीसदी केंद्र सरकार देती थी और 10 फीसदी राज्य सरकारें वहन करती थी लेकिन अब केंद्र सरकार ने इसके नए नियम बदलकर केंद्र का 90 फीसदी भागीदारी से घटाकर 60 फीसदी कर दिया गया है तथा राज्य सरकारों पर 10 से बढ़ाकर 40 फीसदी खर्च लाद दिया गया है। केंद्र सरकार ने दूसरी होशियारी यह दिखाई है कि इसके कार्य दिवस 100 से बढ़कर 125 करने की बात कही गई है लेकिन सच यह है कि यह सरकार 100 दिन काम भी नहीं दे पा रही थी सिर्फ 50—60 दिन ही काम दे पा रही थी। केंद्र राज्यों को इस योजना का पैसा समय से नहीं दे रहा था इसलिए भी काम ठप हो गया था इन तमाम झमेलों से बचने के लिए कानून बदल दिए गए। राज्यों से जब उनकी आय के सभी साधन छीने जा चुके हैं तो वह 40 फीसदी कहां से देंगे। इसलिए भी अब मनरेगा का मरना तय कर दिया गया है। यह देश के मजदूरों के पेट पर लात मारने जैसा ही है। इसके खिलाफ अब नरेगा जैसे संगठन सड़कों पर उतरने का ऐलान कर रहे है। जी राम जी का गुणगान करने वाले भाजपा सांसदों को अब राम नाम का ही सहारा शेष बचा है। क्योंकि देश की जनता इनके एक—एक काम को लेकर आग बबूला है तथा पानी पी—पीकर इन्हें कोस रही है। और विपक्ष सरकार को तानाशाही करने से रोक नहीं पा रहा है ऐसी स्थितियों में देश की जनता को अब एक बड़े बदलाव का इंतजार है।


