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उत्तराखण्ड में वन्य जीवों का खौफ

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सर्दियाें के मौसम में उत्तराखण्ड राज्य में वन्य जीवों का खौफ लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह खौफ किसी विशेष क्षेत्र में है गढ़वाल व कुमांऊ मंडल के पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में वन्य जीव व मानव संघर्ष की खबरें लगातार सामने आ रही है। यूं तो पूर्व समय से ही गुलदार, हाथी व टाईगर मानव बस्तियो व गांवो में घुसकर हमले करते रहे है। लेकिन इस वर्ष इन सबके बीच भालू भी कम हिसंक नही रहा है। भालुओं के हमले की खबरे देखकर ऐसा लगता है कि इस साल भालू जो कि हर सर्दियों के मौसम में शीत निद्रा में चला जाता था, नहीं गया और वह पहाड़ी क्षेत्र के गांवों में आंतक का पयार्य बन चुका है। बीते दिनो एक खबर सुर्खियों में थी कि पौड़ी क्षेत्र के एक गांव में जहंा पलायन के कारण पहले ही गांव जनविहीन हो चुका था और उसमें एक परिवार निवासरत था वह भी भालू के आंतक के चलते गांव छोड़ने पर मजबूर हो गया। ऐसा नहीं है कि राज्य में इस वर्ष सिर्फ भालुओं के ही हमले बढ़े है इसके अलावा गुलदार व मानव सघर्ष में भी बढ़ोत्तरी देखी गयी है। इस साल पहाड़ी जनपदों में गुलदार द्वारा कई हमलों की घटना को अंजाम दिया जा चुका है। जिसके बाद प्रशासन व वन विभाग द्वारा आंखे खोलते हुए इनमें से कुछ गुलदारों को जहंा पकड़ा गया तो वहीं कुछ को शिकारियों की गाेंलियो से धराशाही करा दिया गया। कुमांऊ मंडल के जिम कार्बेट पार्क से सटे गांवों में बंगाल टाईगर के आंतक की कहानी खुद स्थानीय लोगों की आंखो में दिखायी देता है। यहंा चार दिन पूर्व जगंल में घास लेने गई कुछ महिलाओं पर बंगाल टाईगर द्वारा हमला किया गया जिसमें एक महिला की मौत हो गयी वहीं एक विशिप्त किस्म के व्यक्ति को भी बंगाल टाईगर का शिकार होना पड़ा था। राज्य मेें बढ़ते मानव व वन्य जीव संघर्ष को बुद्धीजीवी कई नजरिये से देख रहे है। कुछ इसे जलवायू परिवर्तन का कारण बताते है तो कुछ इसे मानव का जंगल क्षेत्रों में दखलअंदाजी करना मुख्य कारण मानते है। हां यह बात सच है कि राज्य में कुछ वन्य जीव तस्कर जंगलो में घुसकर इन मांसाहारी जीवों का शिकार यानि कि हिरण, काखड़, खरगोश, जंगली मुर्गे आदि कई तरह का शिकार करके इन मासंाहारी जीवों के भोजन को खत्म कर रहे है जिससे यह मांसाहारी वन्य जीव आसान भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में आ रहे है। सरकार को अब मानव व वन्य जीवों के संघर्ष में कमी लाने के लिए ठोस प्रयास करने की जरूरत है नहीं तो राज्य से पलायन का यह मुख्य कारण कभी समाप्त नही हो सकेगा। इसके लिए चाहे कितने भी पलायन आयोग क्यों न बना लिये जाये?

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