कांग्रेसियों का कुर्ता घसीटन

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कांग्रेस के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है जब भाजपा के नेता राज्य में मिली बंपर जीत के बाद भी इस पर गंभीर चिंतन मंथन कर रहे हैं कि उन्हें जिन 23 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा उस हार के कारण क्या रहे? वहीं कांग्रेसी नेता लगातार दूसरी शर्मनाक हार के बाद भी एक दूसरे की कुर्ता घसीटन में लगे हुए हैं। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीतकर सूबे की सत्ता को अपने पास बरकरार रखा है। भाजपा की जगह अगर कांग्रेस को ऐसी सफलता मिलती तो शायद वह एक बार भी यह सोचने की जरूरत नहीं समझती कि जिन सीटों पर हार मिली उसके पीछे क्या कारण रहे। लेकिन भाजपा जिसने 2017 के चुनाव में 70 में से 57 सीटें जीती थी और अब 70 में से 47 सीटें जीती है वह उन 23 सीटों पर हार के कारण तलाश रही है जो वह नहीं जीत सकी। आज की भाजपा और कांग्रेस में क्या फर्क है वह यह बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस के नेता अपनी दो बार की इस करारी हार पर खुले मंच से समीक्षा करने की बजाय एक—दूसरे पर गंभीर आरोप—प्रत्यारोप लगा रहे हैं और चुनाव से पूर्व ही सीएम के चेहरे पर लड़ने वाले यह नेता अब नेता विपक्ष की कुर्सी के लिए सिर फुट्टवल कर रहे हैं। बीते कल पूर्व सीएम हरीश रावत ने तो अपनी पार्टी के नेताओं पर भाजपा के नेताओं के साथ मिले होने और अपने खिलाफ टीका—टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि वह इसकी जांच की मांग को लेकर कांग्रेस भवन में धरने पर बैठ जाएंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस में गुटबाजी अपने चरम पर स्तर पर है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने ऊपर दूसरे गुट द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से हमले करने की बात कह रहे हैं तो यह साफ है कि उस कांग्रेस का एक गुट वह स्वयं भी है। उनका यह आरोप सच हो सकता है कि दूसरे गुट ने उन्हे हराने का प्रयास किया हो अथवा वह उनकी बेटी अनुपमा को भी हराने की चाहत रखते हो लेकिन पिछले दो चुनावों में कांग्रेस को जिस तरह की शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है ऐसे आरोप—प्रत्यारोप लगाकर वह अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हैं। यह दोनों ही चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़े गए हैं एक चुनाव में वह सीएम होते हुए तथा सीएम का चेहरा भी होते हुए दो सीटों पर चुनाव लड़कर भी दोनों सीट चुनाव में हारे थे वहीं इस बार भी वह चुनाव नहीं जीत सके। रामनगर सीट से चुनाव लड़ने के उनके प्रयास के कारण चुनावी दौर में जो बवाल हुआ और रंजीत रावत को यहां से अपनी दावेदारी छोड़नी पड़ी तथा उन्हें खुद भी लाल कुआं सीट पर जाना पड़ा इसके पीछे हुए बवाल और प्रत्याशियों को टिकट देकर फिर काटे जाने के पीछे वह खुद ही थे जिस का भारी नुकसान पार्टी और खुद उन्हें भी हुआ। चुनाव से पूर्व स्वयं को सीएम का चेहरा घोषित कराने की लड़ाई को स्वयं वही लड़ते देखे गए जबकि पूरी पार्टी सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने पर अड़ी थी। ऐसे में अगर वह इस हार के लिए दूसरे गुट को जिम्मेदार ठहराये या यह कह कर कि दूसरा गुट भाजपा के साथ मिलकर उन पर गोले दाग रहे हैं उचित नहीं माना जा सकता है। वह पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता माने जाते हैं अगर वह खुद अपने उत्पीडन का आरोप लगाकर धरना देंगे तो फिर बाकी कांग्रेसियों और कांग्रेस का क्या होगा इस पर भी उन्हें मंथन करने की जरूरत है।

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