निकाय चुनाव तय करेंगे, कल का सिकंदर कौन?

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क्या पूर्ण प्रदर्शन दोहरा पायेगी भाजपा
भाजपा की हाईलेवल मीटिंग कल
देहरादून। उत्तराखण्ड में होने वाले निकाय चुनाव भाजपा व कांग्रेस के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जा रहे इन चुनावों पर भाजपा के सामने शीर्ष पर बने रहने की चुनौती है तो कांग्रेस के पास अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः हासिल करने का मौका है। भाजपा भले ही स्वयं को अजेय मान रही है लेकिन वह ढ़ील छोडने को तैयार नहीं है। भाजपा द्वारा कल निकाय चुनाव की तैयारियों पर उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जायेगी।
18 नवंबर को होने वाले निकाय चुनाव की तैयारियों के लिए भाजपा को भले ही कम समय मिला हो लेकिन संगठन के स्तर पर निकाय चुनाव तैयारियों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी गयी है। प्रत्याशियों के चयन पर कई स्तर पर छानबीन जारी है भाजपा किसी भी कमजोर प्रत्याशी को चुनाव में नहीं उतारेगी। पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से लेकर तमाम पदाधिकारियों को जिम्मेवारी सौंपी जा चुकी है। भाजपा संभवतः कल या परसो तक प्रत्याशियों की सूची जारी करने की बात कह रही है। सूची जारी करने से पहले प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट द्वारा कल एक हाईलेवल बैठक बुलाई गयी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस बैठक में सभी चार पूर्व मुख्यमंत्री, सभी सांसदो और सभी महामंत्रियों को बुलाया गया है। बैठक में सभी निकायों के प्रत्याशियों की सूची पर विचार मंथन किया जाएगा। भाजपा का प्रयास है सिर्फ उन्हें उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा जाए, जिनकी जनता के बीच अच्छी छवि व पकड है। भाजपा द्वारा इस दौरान प्रत्याशियों के बारे में सर्वे भी कराया जा रहा है।
भाजपा का फोकस मुख्य तौर पर सभी सात मेयर सीटों पर है। पिछले निकाय चुनाव में भाजपा ने आठ में से छह मेयर सीटों पर कब्जा किया था जिन दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते उनमें एक भाजपा व एक कांग्रेस के पाले में चले गये थे। भाजपा का प्रयास होगा कि वह अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा सके। जो एक बडी चुनौती के रूप में उसके सामने है। भाजपा ने बागियों की वापसी के मद्देनजर भाजपा महानगर मंडल सहित कई बैठकों का दौर जारी रहा।

कांग्रेस के पास मौका भी चुनौती भी
घर की एकता सबसे बडी चुनौती
देहरादून। लोकसभा चुनाव फिर उसके बाद विधानसभा चुनाव व उपचुनाव में करारी शिकस्त के बाद अब राज्य में हो रहे निकाय चुनावों में कांग्रेस के पास वापसी का अच्छा मौका है लेकिन यह मौका भी है और एक बडी चुनौती भी। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के नेतृत्व में लडे जा रहे यह चुनाव न सिर्फ प्रीतम सिंह के लिए एक बडी अग्निपरीक्षा है अपितु कांग्रेस के भविष्य की पटकथा लिखने में भी इन चुनावों की अहम भूमिका होगी।
चुनाव भले ही निकाय के हैं लेकिन इनकी सफलता और असफलता का संदेश दूर तक जाने वाला है। इस सत्य को कांग्रेस के नेताओं द्वारा बहुत ही गंभीरता से महसूस किया जा रहा है यही कारण है कि कांग्रेस के हिस्सों हिस्सों में बंटे नेता एक मंच पर आकर एकता का पाठ पढ़ा रहे है अगर कांग्रेस इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी तो लोकसभा चुनाव मेें भी वह कुछ अच्छा नहीं कर सकेगी। यह इन चुनावों से ही साफ हो जायेगा।
कांग्रेस के सामने वास्तव में यह चुनाव करो या मरो की स्थिति वाले हैं । कांग्रेस का संगठैनिक ढ़ांचा भी उतना मजबूत नहीं जितना भाजपा का है इसलिए यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है। इसके ऊपर से पैसे की कमी के जो समाचार छन छन कर आ रहे हैं वह भी परेशान करने वाले हैं। भले ही कांग्रेस के नेता यह तर्क दे रहे हों कि पैसे से चुनाव जीतने का काम तो भाजपा करती है कांग्रेस नहीं लेकिन चुनाव लडने के लिए पैसा तो चाहिए ही। वहीं भाजपा द्वारा कांग्रेस के आंतरिक मतभेदों को लेकर दिनेश अग्रवाल द्वारा पैर पीछे खींच लिए जाने की बात फैलाई जा रही है और अभी से प्रचार किया जा रहा है कांग्रेस तो चुनाव लडने से पहले ही हार मान चुकी है। कांग्रेस को बैकफुट धकेलने क ेलिए भाजपा ने अभी से कमर कस ली है। देखना होगा कि भाजपा से कांग्रेस कैसे पार पाती है। हालांकि दिनेश अग्रवाल का कहना है वह तो दौड में शामिल ही नहीें थे।
कांग्रेस के सामने अपने घर को बचाने और उसे एक रखने की चुनौती सबसे बडी चुनौती है। हालांकि कांग्रेस को उम्मीद है कि परिसीमन और आरक्षण को लेकर जो विरोध और आक्रोश लोगों में है उसका उसे इस चुनाव में पूरा फायदा मिलेगा। वहीं उसने अपनी तैयारियों में पूरी ताकत लगा रखी है क्योंकि उसे पता है कि यही मौका है जो उसके लिए पुनः सत्ता के द्वार खोल सकता है।

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