अब हाशिये पर है महत्वाकांक्षी येदियुरप्पा !

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कृष्णमोहन झा/
कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के मन में अभी भी यह टीस बनी हुई है कि वे चुनाव के बाद सबसे बड़े दल के रूप में विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए और सत्ता उनके हाथ में आकर भी फिसल गई। राज्य में कांग्रेस एवं जेडीएस सरकार के गठन को लगभग चार माह बीत चुके है और दोनों दलों की और से तमाम मतभेदो बाद भी यही संकेत मिले है कि लोकसभा चुनाव तक वे सरकार को गिरने नहीं देंगे, परन्तु येदियुरप्पा अभी भी उम्मीद लगाए बैठे है कि दोनों दल एक दूसरे का साथ ज्यादा दिन तक नहीं निभा पाएंगे तथा सत्ता की डोर एक बार फिर उनके हाथ में आ जाएगी।
गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने विगत दिवस जब यह कहा था कि वे गठबंधन का जहर पीने को विवश और यह कहते हुए उनकी आँखें भर आई थी तब से येदियुरप्पा की उम्मीदें कुछ बढ़ गई थी और वे पुन: मुख्यमंत्री बनने का सपना सजा चुके है। इधर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि राज्य की गठबंधन सरकार को जल्द गिराया जाए। केंद्रीय नेतृत्व अभी प्रतीक्षा करो एवं देखों की नीति पर चलने के पक्ष में है, क्योंकि उसे भी लगता है कि कुमारस्वामी की सरकार अपने अंतर्विरोधों के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। इसलिए भाजपा नेतृत्व सरकार को गिराने का इल्जाम अपने सिर पर नहीं लेना चाहता। पार्टी को लगता है कि उसने यदि असंतुष्ट विधायकों को अपने पाले में कर सरकार बना ली तो आगामी लोकसभा चुनाव में दोनों दलों को उसपर आक्रमण करने का बड़ा मौका मिल जाएगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कुमारस्वामी के पिता एवं जनता दल एस के सुप्रीमों एच डी देवेगौड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच संबंधों में अभी तक मैत्रीभाव ही दिखाई दिया है।इसीलिए भी पार्टी को कर्नाटक सरकार को गिराने कोई जल्दी नहीं है, लेकिन सवाल यह उठता है कि भाजपा की प्रतीक्षा इतनी लंबी न खिच जाए कि भविष्य में उसकी सरकार बनाने की संभावनाएं धूमिल हो जाए। इधर पार्टी की यही नीति येदियुरप्पा की अधीरता में भी वृद्धि कर रही है। येदियुरप्पा को लगता है कि उन्हें अभी यदि इस दौड़ से बाहर रहना पड़ा तो शायद भविष्य में वे हमेशा के लिए इस दौड़ से बाहर हो जाएंगे। हालांकि उनकी इस जल्दी का असर राज्य के अन्य वरिष्ठ नेताओं पर बिल्कुल भी नहीं दिखाई दे रहा है।
कर्नाटक के वरिष्ठ लिंगायत नेता बीएस येदियुरप्पा को विधानसभा में शक्ति परीक्षण के दौरान जिस अपमान का घुट पीने को मजबूर होना पड़ा था, उसकी कड़वी यादें अभी भी उनके जेहन में बनी हुई है। इन यादों से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि सत्ता की चाबी एक बार फिर उनके हाथों में आ जाए। येदियुरप्पा इसके लिए केवल यह कर सकते है कि वे गठबंधन के 16 विधायकों को तोड़ ले, लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन इस मामले में पूरी चौकसी बरते हुए है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पार्टी के कर्नाटक प्रभारी केसी वेणुगोपाल येदियुरप्पा को पहले ही चेतावनी दे चुके है कि वे सत्तारूढ़ गठबंधन के किसी भी विधायक को तोडऩे की कोशिश न करे।
कुल मिलाकर आज की स्थिति में येदियुरप्पा को अपनी कोशिशों में सफलता मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। वे जानते है कि लोकसभा तक यदि ये सरकार निरापद रूप से चलती रही तो उनका राजनीतिक भविष्य निरापद नहीं रहेगा । हो सकता है कि भाजपा उन्हें उनकी उम्र का तकाजा देकर मुख्यमंत्री पद की दौड़ से ही बाहर कर दे। इसीलिए येदियुरप्पा को अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति ने चिंतित कर रखा है। इसीलिए वे हर संभव कोशिश में लगे है, लेकिन हालात अभी उनके पक्ष में नहीं है यह उन्हें भी मान ही लेना चाहिए।

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