पिक्चर चल जाए, तो कमियां भी खूबी बन जाती हैं:नुसरत भरूचा

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प्यार का पंचनामा सीरीज और फिल्म सोनू के टीटू की स्वीटी की कामयाबी के बाद ऐक्ट्रेस नुसरत भरूचा सबकी फेवरिट हो गई हैं। हंसल मेहता की फिल्म तुर्रम खान में राजकुमार राव के ऑपोजिट काम कर रहीं नुसरत से हमने की यह खास बातचीत:
फिल्म इंडस्ट्री में चढ़ते सूरज को सलाम किया जाता है। सोनू के टीटू की स्वीटी की सफलता के बाद लोगों का नजरिया कितना बदला है?
यह बिल्कुल सही है। पहले लोगों को विश्वास नहीं होता है कि आप कुछ कर लेंगे। पहले लोगों को आपमें बहुत सारी कमियां दिखती हैं कि ये कम है, वह कम है। फिर, जब आप कुछ बन जाते हैं, तो उन्हें आपमें वे कमियां नहीं दिखतीं। तब लगता है कि यह तो बहुत सही था, वह तो बहुत अच्छा था। मुझे यह बदलाव बहुत अजीब लगता है, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं तो अब भी वही कर रही हूं, जो पहले कर रही थी। लेकिन अब पॉप्युलैरिटी के हिसाब से लोगों ने मुझे एक्सेप्ट कर लिया है, तो आपको अब वह कमियां नहीं लगती। पहले मेरे ड्रेसिंग सेंस में भी लोग 5० नुक्स निकाल देते थे, अब मैं कुछ भी कपड़े पहन लूं, तो वह सबको अच्छा लगता है। हां, इस वजह से बहुत सी मुश्किलें भी थोड़ी आसान हो गई हैं, लेकिन स्ट्रगल अब भी है। आगे काम करना है, तो प्रॉसेस अब भी वही है कि लोगों से मिलना है, काम देखना है।
फिल्मों के ऑफर्स भी तो बढ़ गए होंगे। फिल्में चुनने में दिक्कत हो रही है?
दिक्कत तो हो रही है यार। यह तय करने में दिक्कत हो रही है कि इस पड़ाव पर आपको क्या करना चाहिए और आपको पसंद क्या है? इसीलिए, मैं टाइम लेकर काम चुन रही हूं। अच्छी बात यह हुई है कि पंचनामा सीरीज की फिल्मों के बाद जहां मुझे कैरीकेचर वाले, चालू लड़की वाले रोल ही ऑफर होते थे, वहीं सोनू की टीटू की स्वीटी के बाद लोग मुझे अच्छी ऐक्ट्रेस बोलने लगे हैं। यह सोच अब जाकर बनी है, तो ऑफर्स भी अलग-अलग तरह के मिल रहे हैं। मैं पहले एक साल, दो साल में एक फिल्म करती थी। अब हो सकता है कि एक साल में तीन फिल्में कर लूं और तीनों बहुत अलग हैं।
आउटसाइडर होने के नाते इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाना कितना मुश्किल रहा?
बहुत ज्यादा। मुझे पहले लगा नहीं था कि इतना मुश्किल होगा, क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि अगर मैं अच्छा कर रही हूं, तो मुझे क्यों कोई नहीं लेगा? लेकिन बहुत ही ज्यादा मुश्किल था। ऐसे कई दिन आए हैं, जब मुझे लगा कि अब इससे ज्यादा नहीं हो सकता। अब खत्म करते हैं। मैंने हर चीज का ऑडिशन दिया, टीवी शो के लिए, ऐड के लिए और जहां जाती, वहां उतने ही ज्यादा लोग होते। मुझे लगता था कि यार, मुंबई के सारे लोग इसी रूम में आकर बैठे हुए हैं और इसी चीज का ऑडिशन देने आए हैं। ऐसा लगता था कि ऐक्टिंग नहीं हो पाएगी। पापा का बिजनेस कर लेती हूं या पढ़ाई कर लेती हूं, लेकिन किस्मत भी कोई चीज होती है। 8 साल पहले मैं अशोक मेहता जी के ऑफिस गई थी। लव सर उनके असिस्टेंट थे। वहां उन्होंने मुझे देखा था। उसके दो साल बाद वह अपनी पहली पिक्चर बना रहे थे, तो उन्होंने मुझे कॉल किया।
आपकी पिछली फिल्में बेशक बड़ी हिट रहीं, लेकिन उन्हें सेक्सिस्ट भी करार दिया जाता है। आपकी क्या राय है?
आप मुझे प्यार का पंचनामा और उसके सीच्ल के बारे में बोलो कि वह बहुत सेक्सिस्ट थीं, तो शायद एक पॉइंट पर मैं आपसे सहमत रहूंगी, क्योंकि उसमें बोला गया कि भई लड़कियां ऐसी होती हैं, वैसी होती हैं। एक पूरा मोनोलॉग है लड़कियों के खिलाफ, लेकिन मुझे बुरा यह लगता है कि हमने तो फिल्म बनाई, लेकिन फिल्म चलाई आपने। पसंद आपने की। अभी भी ऐसे लड़के-लड़कियां हैं, जो कहते हैं कि वह मोनोलॉग बोलो। आप वह सुनकर रोते नहीं, ऑफेंड नहीं हो, आप हंसते हैं। आप हंसते इसलिए हैं, क्योंकि हमने कॉमिडी फिल्म बनाई है। कॉमिडी में थोड़ा एक्स्ट्रा करना पड़ता है। हमने लड़कों के पॉइंट ऑफ व्यू से फिल्म बनाई, तो लड़कियां बुरी हैं। लड़कियों के पॉइंट ऑफ व्यू से बनाओगे, तो लड़के बुरे होंगे, तो क्या हम एंटीमैन हो गए? (आरएनएस)

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