सपने तो हिन्दी में लेने दीजिये

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शमीम शर्मा
कक्षा में अध्यापक ने बच्चों को अंग्रेजी में ‘माई ड्रीम’ विषय पर निबन्ध लिखने को कहा। सारे बच्चे उसी वक्त लिखने में जुट गये। एक लड़की हाथ पर हाथ धरे बैठी रही तो अध्यापक ने डांटते हुए उससे वजह पूछी। लड़की ने मन की सच्चाई उगलते हुए कहा-जी, मैं क्या करूं, मुझे अंग्रेजी में सपने आते ही नहीं हैं। मेरे सपनों में तितली, जुगनू, बादल, भूत, भगवान जो भी आते हैं, सब मुझसे हिन्दी में ही बात करते हैं। फिर वह लड़की हाथ जोड़ते हुए बोली-सर! हम सारे काम अब इंग्लिश में करते हैं, सभी विषय इंग्लिश में पढ़ते हैं, कृपया सपने तो हमें हिन्दी में ले लेने दीजिये। अंग्रेजी का अध्यापक काफी देर तक गुमसुम खड़ा रहा।
पहले हिन्दी दिवस पर बधाई सन्देश या हिन्दी की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए संदेश मिला करते थे पर इस बार तो हिन्दी पर कटाक्ष की झड़ी-सी लगी हुई थी। जिस संदेश ने सर्वाधिक पीड़ा पहुंचाई वह था-‘जिस देश में हिंदी के लिये दो दबाना पड़े और जहां 9० प्रतिशत से ज्यादा लोग अंग्रेजी में हस्ताक्षर करते हों, वहां हिन्दी दिवस की कैसी बधाई।’ किसी ने लिख भेजा कि हिन्दी दिवस हमें मनाना पड़ता है और मनाया उसी को जाता है जो रूठा हुआ हो। हिन्दी हमसे रूठी हुई है क्योंकि आजादी के 71 साल बाद भी उसे राजभाषा का दर्जा होते हुए भी राजभाषा वाली चौधर नहीं मिली।
एक समय था जब हिन्दी की अनबन सिर्फ दक्षिण की भाषाओं से ही थी। पर अब तो ठेठ हिन्दी भाषी राज्यों में भी हिन्दी को पिछड़ा हुआ सा माना जाने लगा है। वैसे तो समाज पहले ही कई कारणों से बंटा हुआ है पर ताज़ा वजह अंग्रेजी भाषा है कि समाज में दो गुट साफ दिखाई दे रहे हैं- अंग्रेजी भाषी और हिन्दी भाषी। अंग्रेजी भाषियों को इंडियन और हिन्दी भाषियों को भारतीय माना जाने लगा है। देश में अंग्रेजी के वर्चस्व को देखते हुए लगता है कि अंग्रेज तो चले गये पर अपनी विरासत छोड़ गये। मुद्दा यह नहीं है कि अंग्रेजी पढ़ी जाये या नहीं। बेशक पढ़ी जाये और खूब पढ़ी जाये पर अंग्रेजी पढऩे के यह मायने कहां से विकसित हो गये कि जो हिन्दी में पले-बढ़े हैं, वे पिछड़े हैं। अंग्रेजी मीडियम विद्यार्थियों ने तो अपनी आंखों पर ऐसा चश्मा लगा लिया है कि उन्हें हिन्दी माध्यम वाले बैकवर्ड प्रतीत होते हैं। इस तरह की मानसिकता पर सिर्फ हैरान हुआ जा सकता है। और यही हैरानी मुझे हो रही है।

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