नींद नहीं आने पर ख़ुद से कहिए ‘कोई बात नहीं’

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सुबह उठकर नींद नहीं आने की शिकायत करने वालों – क्या सच में नींद इतनी बड़ी समस्या है. या कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे समस्या बना दिया गया है. अगर किसी को आप यह बता दें कि उसे जो हो रहा है, वो आम बात नहीं है, वो तो एक समस्या है तो बात बनेगी कम, बिगड़ेगी ज़्यादा. किसी को बीमार बता देना, उसे और बीमार कर देने के लिए काफी है. ऐसा ही कुछ नींद न आने वालों के साथ है. ऊपर से अगर आप किसी को यह कह दें कि सोना ज़रूरी है और कैसे भी करके बस सो जाओ तब तो वो काम उसके लिए सिरदर्द बन जाता है. यह ठीक किसी बच्चे को खाना खिलाने जैसा है. उसका मन होगा तो वो खाएगा और अगर जबरदस्ती खिलाएंगे तो खाना उसके लिए भी सिरदर्द बन जाएगा और खिलाने वाले के लिए भी.
नींद के साथ भी हमने ऐसा की कुछ किया है. नींद 4 घंटे की भी अच्छी होती है लेकिन कहीं न कहीं हमारे दिमाग में बैठ गया है कि जब तक 7-8 घंटे न सो जाओ, नींद-नींद नहीं है. जबकि जानकारों का कहना है कि नींद किसी के लिए 7 घंटे भी काफी है और किसी के लिए इससे कम में भी काम हो जाता है. बस होना यह चाहिए कि सुबह उठकर आप थके हुए महसूस न करें. अगर 7 घंटे की नींद भी आपको थकावट दे रही है तो समस्या कुछ और है और अगर 4 घंटे सोकर भी आप तरोताज़ा महसूस कर रहे हैं. तो सब कुछ ठीक ही है. शोध बताते हैं कि ख़ुद को इनसोमनियाक यानि नींद न आने वाला व्यक्ति मानना, इस समस्या की सबसे बड़ी दिक्कत है. स्लीप रिसर्चर केनेथ लिशेस्टिन ने इनसोमनिया आइडेनटिटी नाम का शब्द तैयार किया है. उनके मुताबिक ठीक से नींद पूरी न करने वाले के तौर पर अपनी पहचान बनाना जि़ंदगी को मुश्किल कर देता है. केनेथ कहते हैं कि वो लोग जिन्हें नींद की दिक्कत है लेकिन वो खुद को इनसोमनियाक नहीं मानते, उन्हें नींद आने से जुड़ी बीपी जैसी बीमारियां नहीं होती. वहीं इसके ठीक उलट वो लोग जो ठीक से सोते हैं लेकिन तथाकथित तौर पर नींद न आने की शिकायत करते रहते हैं – वो ज़्यादातर थके हुए, तनावग्रस्त और अवसाद में पाए जाते हैं.

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