विदेशों में बॉलिवुड का मतलब केवल नाच गाना: फ्रीडा

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स्लमडॉग मिलेनियर से रातों-रात स्टार बनीं फ्रीडा पिंटो बॉलिवुड की अपेक्षा हॉलिवुड में ज्यादा सक्रिय रही हैं। इन दिनों फ्रीडा अपनी बॉलिवुड फिल्म लव सोनिया को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित है, जिसमें फ्रीडा बेहद ही अलग अवतार में नजर आ रही हैं। फिल्म प्रमोशन के सिलसिले में इंडिया आईं फ्रीडा ने मीडिया से दिल खोलकर बातचीत की…
आज से 1० साल पहले पढ़ी थी लव सोनिया की स्क्रिप्ट
फ्रीडा से जब सवाल किया गया कि उन्होंने अपनी इस फिल्म के लिए किस तरह का रिसर्च वर्क किया है? तो जवाब में फ्रीडा कहती हैं, हमारे डायरेक्टर तबरेज अपने रिसर्च वर्क के लिए ही पहचाने जाते हैं। उन्होंने फिल्म में हर एक किरदार पर काम किया है। वैसे अगर रिसर्च की बात हो, तो सबसे ज्यादा मृणाल ने इस पर काम किया है। वह तो कोलकाता के रेड लाइट एरिया में जाकर आई हैं ताकि ग्राउंड लेवल पर चीजों को समझ सकें। रही बात मेरे रिसर्च की तो मेरा 1० साल का रिसर्च है। दरअसल तबरेज ने स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म खत्म होने के बाद मुझे इसकी स्क्रिप्ट दी थी। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ते ही तुरंत हामी भर दी थी। कहानी वाकई बहुत डिस्टर्बिंग फैक्ट्स की ओर इशारा करती है। हमने 1० साल पहले कहानी पढ़ी और फिल्म अब जाकर बनी है बावजूद इसमें कोई बदलाव नहीं है। आज भी इश्यूज जस के तस हैं। लड़कियों की तरस्करी कर उन्हें बेचा जा रहा है। फिल्म के दौरान हमने हर छोटी-छोटी चीजों का खयाल रखा है। कॉस्ट्यूम से लेकर मेकअप हर चीज पर ध्यान दिया गया है। आपको बता दें, हमने जो कॉस्ट्यूम पहना है, वह वहां से मंगाया गया है जहां से प्रॉस्टिट्यूट्स अपने कपड़े खरीद कर लाती हैं। हमने ट्रैफिकिंग पर बहुत सी फिल्में देखी होंगी, लेकिन मैं मानती हूं कि यह सबसे ऑथेंटिक फिल्म होगी।
मैं अपना करियर रिचा की तरह बनाना चाहूंगी
सेट पर मुझे बाकी स्टार्स से घुलने-मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे मनोज बाजपेयी, रिचा चड्डा, अनुपम खेर जैसे मंजे हुए ऐक्टर्स के साथ काम करने का मौका मिला है। एक आर्टिस्ट चाहे, वह कहीं से भी हो, क्राफ्ट के दौरान उनमें कोई अंतर नहीं होता है। मैं रिचा से काफी इंप्रेस हूं। अगर मैं इंडिया में काम कर रही होती और मुझे किसी की तरह करियर बनाना होता तो वह बेशक रिचा होतीं।
बहुत से ऑफर्स पाकर खो हो गई थी
स्लमडॉग के बाद मेरे पास कई फिल्मों के ऑफर्स आने लगे थे। मैंने बहुत सी फिल्में कर भी लीं लेकिन अंदर से कहीं भी संतुष्टि नहीं थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या वाकई मैं यह फिल्में करना चाहती हूं या फिर जो मुझे मिल रहा है, वही करती जा रही हूं। मैं बिलकुल लॉस्ट सी हो गई थी। मुझे लग रहा था कि मैं अपने दिल की बात नहीं सुन रही हूं। फिर मैंने रिस्क लेते हुए ढाई साल का ब्रेक लिया और इस बीच कुछ काम नहीं किया।
इस दौरान खुद को डिस्कवर किया। मुझे लगता है कि मैंने ब्रेक का सही फैसला लिया था। वेस्ट के लोगों के बीच हमारी फिल्मों को लेकर यही धारणा है कि हम मसालेदार फिल्में बनाते हैं और केवल नाच-गाना करते हैं। हालांकि उनकी इस धारणा पर थोड़ा-सा बदलाव तो आया है, लेकिन अभी भी इस पर बहुत काम करना बाकी है। मैं खुश हूं कि हमारे इंडियन सिनेमा में इसकी पहल हो चुकी है।(आरएनएस)

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