लापरवाही के पुल

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कोलकाता में एक 4० साल पुराने पुल के गिरने की घटना अत्यंत दुखद है। मंगलवार शाम दक्षिणी कोलकाता के माजेरहाट में इस पुल के गिरने से हुए जान-माल के नुकसान का पूरा ब्योरा आना बाकी है।
कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि पास में मेट्रो रेलवे के खंभों के निर्माण के चलते पुल कमजोर हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों द्वारा इसकी पुष्टि नहीं की गई है। कुछ समय पहले पुल को लेकर शिकायत आई थी, लेकिन लगता है उस पर ध्यान नहीं दिया गया। बीते 3 वर्षों में कोलकाता में यह दूसरा फ्लाईओवर हादसा है। 2०16 में उत्तरी कोलकाता के भीड़-भाड़ वाले बड़ा बाजार इलाके में निर्माणाधीन विवेकानंद पुल गिर गया था जिससे 26 लोगों की मौत हो गई थी और करीब 9० लोग घायल हो गए थे। देश भर में पुलों, फ्लाईओवरों के गिरने की घटनाएं आम होती जा रही है। इसी साल मई में वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर गिर गया था, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी।
पिछले साल गोवा में एक पुल टूट गया था, जिसमें कई लोग नदी में बह गए थे। 2०16 में गोमती नदी के ऊपर बने एक पुल का बड़ा हिस्सा गिर गया था, हालांकि उससे बड़ा नुकसान नहीं हुआ था। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है कि भारत में हर रोज सात ढांचे गिरते हैं, चाहे वे पुल हों या भवन। उसके आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2०1० से लेकर वर्ष 2०14 तक देश में 13,473 ढांचे गिरे जिनमें 13,178 लोगों की मौत हुई। हमारी विकास प्रक्रिया पर यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। देश में आवागमन और व्यापार बढ़ाने के लिए पुलों का होना जरूरी है। विकास को एक राजनीतिक दलील की शक्ल देने में इनकी सबसे बड़ी भूमिका हुआ करती है। लेकिन इनका इस तरह ढह कर लोगों की जान लेना किसी खास ढांचे को ही नहीं, विकास को ही संदिग्ध बनाता है। दरअसल पुल निर्माण का देश की राजनीति से गहरा रिश्ता है। हर पार्टी की सरकार अपने चहेतों को पुल बनाने का ठेका देती है। उनके काम की चलिटी पर प्राय: नजर नहीं रखी जाती क्योंकि कुछ मलाई निगरानी रखने वाले तंत्र के हिस्से भी आ जाती है।
इस तरह पुल बनाने में भारी भ्रष्टाचार होता है और खराब डिजाइनिंग या कमजोर सामग्री के कारण उनमें कई अपने जीवन काल का एक तिहाई रास्ता पार करने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पुल बन जाने के बाद उसकी नियमित देखरेख और मेंटिनेंस भी जरूरी है। दरअसल एक पुल को कई तरह के प्राकृतिक और मानवीय तत्व प्रभावित करते हैं। जैसे आसपास पानी भरना, भारी निर्माण कार्य शुरू होना या फिर भारी वाहनों की आवाजाही अचानक बढ़ जाना। इन सबसे पुल कमजोर पडऩे लगते हैं, लेकिन इनकी जांच करने वाले दफ्तर से ही इन्हें ठीक बताते रहते हैं। इतनी घटनाओं के बाद बीसेक साल पुराने सारे पुलों की सेफ्टी ऑडिटिंग होनी चाहिए और समय रहते इन्हें सुरक्षित रखने के इंतजाम किए जाने चाहिए।

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