तब दोस्ती अब दबाव

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अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 3० करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता रद्द करने का निर्णय किया है। हालांकि बाद में स्पष्टीकरण आया कि यह फैसला पुराना है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन के मुताबिक मदद रोकने का निर्णय इसी साल जनवरी में लिया गया था। शनिवार को खबर आई थी कि अमेरिकी सेना ने आतंकियों से निपटने में असफल रहने पर पाकिस्तान को दी जाने वाली इस सहायता राशि पर रोक लगा दी है। कल अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो पाकिस्तान के दौरे पर जा रहे हैं। संभव है, सहायता रोकने वाला बयान बातचीत से पहले दबाव बनने के मकसद से आया हो। अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध राजधानी इस्लामाबाद से थोड़ी ही दूर पर ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद से ही खराब हो गए थे।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का रुख धीरे-धीरे पाकिस्तान के प्रति काफी सख्त होता नजर आया था, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप का रवैया शुरू से ही सख्त है। दरअसल अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी कार्रवाई के लिए पाकिस्तान को एक पार्टनर के रूप में देखा लेकिन कई ऐसी रिपोर्टें आईं जिनसे पता चला कि पाकिस्तान ने एक तरफ तालिबानियों से लड़ाई छेड़ रखी है, लेकिन दूसरी तरफ उन्हीं के एक गुट को सहायता भी दे रहा है। इस दोहरे खेल ने अमेरिका के कान खड़े कर दिए। उसे लगा कि उसी के पैसे से पाकिस्तान तालिबान को मजबूत बना रहा है। इसलिए धीरे-धीरे अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। जब अमेरिका पाकिस्तान पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाता है तो उसका आशय कश्मीर में आतंक फैलाने वालों से नहीं बल्कि हक्कानी नेटवर्क या दूसरे आतंकी समूहों से होता है। दूसरी बात यह है कि पिछले कुछ समय से पाकिस्तान जिस तरह चीन से सामरिक-व्यापारिक संबंध बढ़ा रहा है और इसके लिए उसकी हर शर्त मानता जा रहा है, वह भी अमेरिका को नागवार गुजरता रहा है। इसलिए अमेरिका उस पर दबाव बनाए रखना चाहता है। अभी पाकिस्तान में सत्ता बदली है। अमेरिका नए नेतृत्व की थाह लेना चाहता है और उसे एक मौका भी देना चाहता है। माइक पॉम्पियो की यात्रा का यही मकसद है। वह पाकिस्तान पर दबाव डालकर उसे फिर से आर्थिक सहायता की पेशकश कर सकते हैं। पाकिस्तान पिछले कुछ समय से विश्व बिरादरी में अलग-थलग पड़ा है। अपना अलगाव दूर करने के लिए वह अमेरिका से सहयोग बढ़ाना चाहेगा। अमेरिकी सहायता भी वह एकदम से नहीं खोना चाहेगा। इसलिए संभव है कि आतंकवाद के खिलाफ वह अपना रवैया सख्त करे। ऐसा हुआ तो यह खुद उसके हितों के लिए भी अच्छा रहेगा। रही बात भारत की तो अमेरिका-पाकिस्तान कड़वाहट से हमें कुछ नहीं मिलने वाला। (आरएनएस)

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