लघुकथा की नींव के साक्षी

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कमलेश भारतीय
लघुकथा की नींव में कितने लेखकों ने अपना सर्वस्व तक होम कर दिया। ऐसे ही रचनाकारों को डॉ. रामकुमार घोटड़ ने ‘स्मृति शेष : लघुकथाकारÓ संग्रह में प्रस्तुत किया है। यह उन रचनाकारों के प्रति श्रद्धांजलि भी है और लघुकथा के उस रूप का परिचय भी जब इसका शैशव काल था।
स्मृति शेष लघुकथाकारों में विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाईं, शंकर पुणतांबेकर, सतीश दुबे, विक्रम सोनी, कृष्ण कमलेश, जगदीश कश्यप, पृथ्वी राज अरोड़ा, बालेन्दु शेखर तिवारी, डॉ. स्वर्ण किरण, श्याम सुंदर व्यास, सुगन चंद मुक्तेश जैसे चर्चित लघुकथाकारों सहित कुल चौसठ रचनाकार और उनका लघुकथाकार के रूप मे परिचय भी प्रस्तुत किया गया है। इस तरह लघुकथा विधा के लिए यह एक महत्वपूर्ण कृति बन गयी है। इसमें ऐसे रचनाकार भी हैं, जिनका एक भी लघुकथा संग्रह नहीं आ पाया और ऐसे भी हैं जिन्होंने पत्रिकाओं का संपादन कर इस विधा को अपना स्थान बनाने में योगदान दिया। ऐसा काम कोई शोधार्थी ही कर सकता हैं, जो डॉ. रामकुमार घोटड़ ने कर दिखाया।
विष्णु प्रभाकर की चर्चित लघुकथा फर्क, हरिशंकर परछाईं की अपना पराया, जगदीश कश्यप की सहकर्मी, पृथ्वी राज अरोड़ा की कील, सुरेंद्र वर्मा की तीन काल, सुरेश शर्मा की राजा नंगा है, सुरेंद्र मंथन की राजनीति, सतीश दुबे की पासा, शंकर पुणतांबेकर की चुनाव जैसी अनेक लघुकथाएं हैं जो पहले से ही खूब चर्चित और पढ़ी व सराही गयीं हैं। इन्हें एक संकलन में देखना पढऩा बहुत सुखद अनुभव होगा।
लघुकथा की नींव में इन सभी रचनाकारों ने बहुत योगदान दिया। विक्रम सोनी ने आघात का, कृष्ण कमलेश ने यात्रा का, सतीश दुबे ने वीणा का, जगदीश कश्यप ने मिनीयुग जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर इसके मार्ग को प्रशस्त बनाया। यह संकलन संग्रहणीय भी है और उल्लेखनीय भी। यदि इसे पेपरबैक प्रकाशित कर मूल्य कम रखा जाता तो और भी अच्छा रहता।

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