फिर भी देश है पानी-पानी

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सहीराम
देश पानी-पानी है साहब! हमारे यहां बारिश की वजह से पानी-पानी होने का रिवाज नहीं है, बल्कि शर्म से पानी-पानी होने का रिवाज है। हालांकि लोग कहते हैं शर्म से पानी-पानी होने वाला पानी तो आजकल आंखों में बचा ही नहीं। वो पानी मुल्तान गए। इसलिए जनाब देश इसलिए तो पानी-पानी बिल्कुल भी नहीं है कि पांच दिग्गज बुद्धिजीवियों को पुलिस ने माओवादी कहकर पकड़ लिया।
जब लिंचिंग से, बच्चियों के साथ बलात्कारों से देश पानी-पानी नहीं हो रहा तो बुद्धिजीवियों की धरपकड़ से क्या पानी-पानी होगा। गनीमत समझो कि कर्नाटक के वह भाजपायी विधायक अभी तक गृहमंत्री नहीं बने हैं, जिन्होंने घोषणा की थी कि अगर मैं गृहमंत्री हो जाऊं तो सभी बुद्धिजीवियों को गोली से उड़ा दूं। सही बात है, बुद्धिजीवी सरकार को परेशान करने के अलावा करते क्या हैं।
पानी-पानी होने का सिलसिला असल में केरल से शुरू हुआ और इधर गुडग़ांव तक पंहुच गया। कल केरल पानी-पानी था, आज गुडग़ांव पानी-पानी है। गुरुमूर्ति जी बता रहे थे कि सबरीमाला में महिलाओं को प्रवेश देने की कोशिशों से भगवान नाराज हैं, इसलिए केरल पानी-पानी हुआ। उन्हें थोड़ा-सा यह भी बता देना चाहिए कि कहीं गुडग़ांव वाली शीतला माता भी तो किसी वजह से नाराज नहीं हैं जो गुडग़ांव इतना पानी-पानी हो गया।
असल में सब बदल रहा है। अब उत्तराखंड भी पानी-पानी है। उत्तराखंड में कौन-सा देवता नाराज है, पता नहीं। वैसे तो वहां केरल की तरह कम्युनिस्टों की सरकार थोड़े ही है कि देवता नाराज हो जाएंगे। भाजपा की सरकार है और भाजपा की सरकार हो तो फिर दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों की तो बात छोड़ो, देवताओं को भी नाराज होने का हक नहीं दिया जाता। फिर भी उत्तराखंड क्यों पानी-पानी है। वह तो देव भूमि है। यूं तो केरल वाले भी कहते हैं कि केरल ईश्वर की अपनी धरती है। पर इन देव भूमियों में ही जलप्लावन है। सब पानी-पानी है लेकिन गुडग़ांव का क्या दोष है। वह क्यों पानी-पानी है, विकास के चलते। वहां करोड़ों का एक-एक फ्लैट है, पर पानी की निकासी नहीं है। जरा-सी बारिश क्या आयी, सब पानी-पानी हो गया।
लोग कहेंगे कि दोष क्यों नहीं-सारे जोहड़ों, तालाबों पर तो कंक्रीट खड़ा कर दिया। पर नहीं जी, यह विकास है। गुडग़ांव, गांव से मिलेनियम सिटी इसी तरह तो बना है। पर देखो जी दिल्ली के नजफगढ़ ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए। वहां एक ही दिन में इतनी बारिश हो गयी, जितनी चेरापूंजी में भी नहीं होती। जलवायु परिवर्तन पर छाती पीटने की बजाय दिल्ली वाले चाहें तो इसी पर गर्व कर सकते हैं। नहीं?

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