दिवालिया होतीं कंपनियां

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भारतीय बैंकिंग व्यवस्था एक बड़ी परीक्षा के दौर से गुजर रही है। रिजर्व बैंक के नए निर्देशों के मुताबिक करीब 7० कंपनियों को अपना कर्जा चुकाने की व्यवस्था करने के लिए 18० दिनों की जो मोहलत दी गई थी, वह आज यानी 27 अगस्त दिन सोमवार को खत्म हो रही है। कुछ कंपनियों ने इस दौरान अपने लिए खरीदार भी खोजे, लेकिन जिन कंपनियों की यहां बात चल रही है, वे इस अवधि में ऐसा कुछ नहीं कर सकीं, जिससे लगे कि वे कर्ज चुकाने की स्थिति में आ गई हैं। आखिरी उपाय के तौर पर कर्जदाता बैंकों ने और इंडस्ट्री ने भी रिजर्व बैंक से मोहलत बढ़ाने की गुजारिश की, लेकिन उसने मना कर दिया।
अब आलम यह है कि 2००० करोड़ रुपये या इससे ज्यादा का कर्ज लिए बैठी इन कंपनियों की सूची नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) के पास भेजी जाएगी, जहां इनके खिलाफ दिवालियेपन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। इन कंपनियों पर कुल 3 लाख 8० हजार करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। समझा जा सकता है कि हमारी बैंकिंग व्यवस्था के लिए यह कितना बड़ा संकट है। ये सभी देश की बड़ी कंपनियां हैं। इनमें कितने लोग काम करते हैं और एक बार दिवालियेपन की प्रक्रिया में जाने के बाद इनका नियमित संचालन किस तरह प्रभावित होगा, इन कर्मचारियों की रोजी-रोटी का क्या होगा, इनसे जुड़े परिवारों का भविष्य क्या होगा, ऐसे तमाम जरूरी सवालों का जवाब देने की स्थिति में फिलहाल कोई नहीं है। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि ये कंपनियां 2००० करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज वाली हैं। 1००० करोड़ रुपये या इससे ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों की बारी इसके बाद आनी है।
इन कंपनियों में उत्पादन बाधित होने से बाजार पर और इनकी सहायक कंपनियों पर पडऩे वाले प्रभावों और इससे पूरी अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसानों को फिलहाल छोड़ दें तो भी यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि क्या यह प्रक्रिया बैंकों को उनका पैसा वापस लौटाने की गारंटी दे पाएगी। अगर 5००० करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज वाली 12 कंपनियों के साथ जुड़े अनुभव पर गौर करें तो जवाब ना में ही मिलता है। इनमें से 11 कंपनियां एनसीएलटी की अलग-अलग बेंचों के जरिए समाधान की अलग-अलग अवस्थाओं में हैं और बैंकों को उनसे अपने पूरे कर्ज की आधी से कुछ ज्यादा रकम ही वापस मिलने की उम्मीद है। जून के अंत तक इन्सॉल्वेंसी एंड बैक्रप्सी कोड (आईबीसी) के तहत जो 32 मामले सुलझाए जा सके थे, उनमें भी रिकवरी कुल दावे की करीब 55 फीसदी ही रही। ऐसे में सवाल यह बनता है कि आईबीसी की यह प्रक्रिया क्या सचमुच हमारी बैंकिंग व्यवस्था की बीमारी दूर कर सकती है? अगर नहीं, तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वसूली में सख्ती के नाम पर अर्थव्यवस्था को और ज्यादा झटके देने के बजाय हम अपना ध्यान बीमारी का कोई बेहतर इलाज खोजने पर केंद्रित करें? (आरएनएस)

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