नारी के व्यथित हृदय की पीड़ा

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सुशील ‘हसरत’ नरेलवी
कवयित्री रश्मि भारद्वाज के काव्य-संग्रह ‘एक अतिरिक्त ‘अ’ की कविताओं के कथ्य में औरत-अन्तस की विभिन्न पीड़ाओं का स्वर मुखरित हुआ है। निराशा, हताशा, शिकस्त, उदासी के झूले में झूलती इन कविताओं में समाहित पीड़ाएं स्वयं ही स्वयं का मरहम बनना चाहती हैं। ये स्वयं ही अपने मनोबल को टटोलती हैं। अपनी स्वयं की एक अलग दुनिया निर्धारित करती हुई प्रतीत होती हैं, जहां पर रौशनी के लिए कोई स्थान नहीं है। हां, जाने-अनजाने में कोई दरार रौशनी को आमन्त्रण दे जाए तो अलग बात है। वैचारिकता के धरातल पर ये कविताएं व्यवस्था को नकारती हैं, कविता ‘इंडिया गेट पर एक टूटा हुआ गमला’। शहरीकरण की चकाचौंध में गुम होती ग्रामीण संस्कृति की पीड़ा का नक्स भी उभरता है इनमें, कविता ‘मेरा शहर’।
औरत-मन की व्यथा, मर्यादित सीमा लांघने की लालसा एवं स्वछन्दता की डोर पकडऩे को आतुर मन की सुन्दर अभिव्यक्ति है संग्रह की कई कविताएं, जैसे ‘वह शिला-सी मज़बूत औरत’, ‘कुछ दिन’, कविता ‘कुछ दिन’ की कुछ पंक्तियां : ‘कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं/ जब मेरी आंखों में तैर जाते हैं कामना के नीले शीशे/ लाल रक्त दौड़ता है दिमाग से लेकर/ पैरों के अंगूठे तक/ एक अनियंत्रित ज्वर/ लावे-सा पिघल-पिघल कर बहता रहता है/ देह के जमे शिलाखण्ड से/ मैं उतार कर केंचुली/ समा देना चाहती हूं ख़्ाुद को/ सख्त चट्टानों के बीच/ इतने करीब कि वह सोख ले मेरा उद्दाम ज्वर/ मेरा सारा अवसाद, मेरी सारी लालसा/ और मैं समेट लूं ख़्ाुद में उसका सारा पथरीलापन/ ताकि खिला सके नरम फूल और किलकती कोमल दूब।’
औरत के एक विशेष चरित्र को खुली आंखों से परिभाषित करती है कविता ‘चरित्रहीन’, प्रेमपाश की एक अलग अभिव्यक्ति की बानगी मिलती है कविता ‘इसे प्रेम ही कहेंगे शायद’ में।
स्त्री-अस्मिता के वजूद पर हावी वहशीपन को लीर-लीर करती हुई ईश्वर के वजूद को भी ललकारती है कविता ’16 दिसम्बर’। कविता ‘बिजूका’ के माध्यम से कवयित्री ने गरीब की बेटी की व्यथा, बेबसी, उसके तार-तार होते सपनों की बेचारगी का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है कवितांश : गरीब की बेटी नहीं जीती/ बचपन और जवानी/ वह जीती है तो सिफऱ् बुढ़ापा/ जन्म लेती है, बूढ़ी होती है और मर जाती है/ इनसान बनने की बात की कहां/ वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी/ दरअसल, वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है/ जो आज तक यह समझ ही नहीं पायी/ कि उसके वहां होने का मकसद क्या है।’
कवयित्री रश्मि भारद्वाज के काव्य-संग्रह ‘एक अतिरिक्त ‘अ” को हम औरत के अन्तर्मन की पीड़ा, कुलबुलाहट, बेचारगी, विवशता, हताशा, टूटन-घुटन व इनसे उपजे हृदय-भावों का कमोबेश मनोविज्ञानात्मक विश्लेषण कह सकते हैं।

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