70 वर्षों मेें देश का कोई राष्ट्रीय खेल नहीं

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’आज राष्ट्रीय खेल दिवस’

देहरादून। आज खेल दिवस है यानि हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद का जन्मदिन, जिन्होंने भारत को हाकी में तीन बार गोल्ड मेडल दिलाकर देश का नाम रोशन किया। भले ही मेरा भारत महान खेल प्रतिभाओं से भरा पडा हों लेकिन यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है ओलंपिक और एशियन गेम्स में अपना झंडा बुलंद करने वाले मेरे भारत का अपना कोई राष्ट्रीय खेल नहीं है। आजादी के आठ दशक बीतने को हैं लेकिन अब तक देश की सरकारों द्वारा इस बात की जरूरत क्यों नही समझी गयी कि जब हमारा एक राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्र भाषा है, राष्ट्रगान है, राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीय पुष्प है, पक्षी है तो फिर राष्ट्रीय खेल क्यों नही हैं?
कई लोग देश के ग्रामीण आंचलों में प्रचलित रही कबड्डी या कुश्ती को राष्ट्रीय खेल समझ लेते हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं है कि वास्तव में हमारा कोई राष्ट्रीय खेल है ही नहीं। भले ही आज तक देश में खेले जाने वाले तमाम खेलों में प्रतिभावान खिलाडियों की भरमार रही हो और वह कुश्ती, क्रिकेट, तैराकी तथा मैराथन व तीरंदाजी तथा निशानेबाजी में अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन करते रहे हों, जैसे ध्यानचंद ने हाकी में किया था। उन्होनें भारत को 1928, 34 व 36 में ओलंपिक में हाकी में न सिर्फ स्वर्ण पदक दिलाये थे। अपितु 1926 से 1948 के बीच 400 गोल दागकर जो रिकार्ड बनाया था उसके लिए उन्हें दुनिया आज भी सलाम करती है। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उनके जन्म दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस तो घोषित कर दिया लेकिन हाकी या फिर किसी अन्य खेल को राष्ट्रीय खेल क्यों घोषित नहीं किया गया, यह समझ से परे है। 2012 में लखनऊ की ऐश्वर्य पराशर ने खेल मंत्रलय से आरटीआई के माध्यम से इस बाबत पूछा था तो जवाब मिला था कि भारत का कोई अपना राष्ट्रीय खेल नहीं है।
सवाल यह है कि जिन खिलाडियों से हम ओलंपिक और एशियन गेम्स में कार्य पदक लाने की उम्मीद रखते हैं उनकी सुविधायें और प्रशिक्षण की क्या सुविधायें दे रहे हैं। भारत जैसे बडे देश का खेलों में फिसड्डी प्रदर्शन सरकारी उपेक्षा की वजह से है। वर्तमान एशियाई खेलों में 9 गोल्ड के साथ 50 पदक जीतने वाला भारत जापान और कोरिया जैसे छोटे देशों जिन्होनें 142 व 118 पदक जीते हैं के मुकाबले कहां ठहरता है। मेजर ध्यानचंद ने जब 1936 में जर्मनी को 8-1 से हराया था तब हिटलर ने उन्हें जर्मन आर्मी में उच्च पद देने की पेशकश की थी लेकिन हम अपने मेडल जीतने वाले खिलाडियों को एक अच्छी नौकरी भी नहीं दे पाते। धन्य है मेरा भारत महान।

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