खेलकूद की गुंजाइश

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बच्चों के जीवन में खेलकूद की अहमियत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया गया है। याचिका के जरिए मांग की गई है कि नर्सरी के स्तर से ही स्पोर्ट्स को स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए और यह भी कि शिक्षा की ही तरह स्पोर्ट्स को भी मूल अधिकारों का हिस्सा माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। लिहाजा इन दोनों सवालों के तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए वह समुचित फैसला देगा। मगर इसमें दो राय नहीं कि ‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराबÓ की मान्यता वाला हमारा समाज इस मोर्चे पर लंबा सफर तय कर चुका है।
एक समय था, जब अच्छा बच्चा होने का मतलब किताबों में घुसे रहना ही माना जाता था। पढ़ाई से इतर भी कोई रास्ता हो सकता है करियर संवारने का, यह किसी की कल्पना में भी नहीं था। लेकिन, करियर के अब इतने तरह के अवसर सामने आ गए हैं कि किस बच्चे की कौन सी प्रतिभा उसे जीवन में आगे बढ़ा देगी इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल हो गया है। ये अलग बात है कि बच्चों के लिए चैन की सांस लेने का मौका फिर भी नहीं बना है। उनके लिए कॉम्पिटिशन इतना बढ़ गया है कि बच्चे, टीचर और मां-बाप सभी परेशान रहते हैं। मुख्यधारा के बच्चों पर रात-दिन पढ़ाई करने, किसी भी तरह से अच्छे मार्क्स लाने और कोई न कोई कॉम्पिटिशन क्लियर करने का हद से ज्यादा दबाव आज भी कायम है।
जो बच्चे स्पोर्ट्स की ओर रुख करते हैं वे भी इस दबाव से बचे नहीं रह पाते क्योंकि उन पर उसी फील्ड में कुछ बहुत अच्छा कर गुजरने का दबाव रहता है। निश्चित रूप से ऐसे भीषण दबाव के प्रभाव में कुछ बच्चे सचमुच असाधारण सा कुछ कर दिखाते हैं, लेकिन ज्यादातर बच्चे नाकामी के भय के साथ जीते हैं जिसका उनके व्यक्तित्व पर बुरा असर होता है। ऐसे में स्पोर्ट्स को अनिवार्य बनाया जाए या नहीं, पर बच्चों को खेलकूद इंजॉय करने का पूरा वक्त देने और उसके लिए मन-मिजाज बनाने पर समाज, परिवार और स्कूल-कॉलेजों को जरूर ध्यान देना चाहिए।(आरएनएस)

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