पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित हो

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अनूप भटनागर

देश के विभिन्न राज्यों में स्थित आश्रय गृहों में महिलाओं और लड़कियों के बलात्कार और यौन शोषण की घटनाओं से उच्चतम न्यायालय विस्मित है। इन आश्रय गृहों का सुर्खियों में आना भी यही संकेत देता है कि इनमें लंबे समय से जबरन महिलाओं और लड़कियों को इस धंधे में धकेला जा रहा था।
बिहार और उत्तर प्रदेश के आश्रय गृहों में कथित यौन शोषण की घटनाओं के बाद सारा मामला केन्दीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया है। जांच करते समय इस बात का भी पता लगाना बहुत जरूरी है कि इन आश्रय गृहों का संचालन करने वाले गैर सरकारी संगठनों के साथ कौन-कौन जुड़ा हुआ है और वे कितने प्रभावशाली या संपर्क वाले हैं। लेकिन, इससे पहले सितंबर, 2०13 में शीर्ष अदालत ने ही एक जनहित याचिका पर सभी गैर सरकारी संगठनों के कामकाज की जांच का आदेश केन्द्रीय जांच ब्यूरो को दिया था। ब्यूरो ने पाया था कि देश में विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यों के लिये करीब 33 लाख गैर सरकारी संगठन पंजीकृत हैं, जिन्हें केन्द्र और राज्य सरकारों से हर साल औसतन करीब 95० करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता मिलती है। इसके बावजूद करीब 9० फीसदी संगठन धन के उपयोग का विवरण ही दाखिल नहीं करते। ऐसी स्थिति में यह एक यक्ष प्रश्न रहेगा कि बिहार और उत्तर प्रदेश के आश्रय गृहों में यौन शोषण की घटनाओं के बारे में सच्चाई कब सामने आयेगी।
अब तक सामने आये तथ्यों से पहली नजर में तो ऐसा ही लगता है कि राज्यों में प्रभावशाली लोगों के संरक्षण के बगैर इतने बड़े पैमाने पर यह संभव नहीं है। जिन शहरों से आश्रय गृहों में यौन शोषण की खबरें सामने आयी हैं, उनके पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी इतने लंबे समय तक क्यों आंखें मूंदे थे? उच्चतम न्यायालय के कड़े रुख के बावजूद कुछ राज्य सरकारों द्वारा आश्रय गृहों का सोशल आडिट कराने में आनाकानी यही संकेत देता है कि इनमें सब कुछ ठीक नहीं है।
दिलचस्प बात तो यह है कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल मई में ही देश के सभी अनाथालयों और आश्रय गृह जैसी संस्थाओं की राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की निगरानी में निरीक्षण कराने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद, बिहार, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और मिजोरम सरीखे कुछ राज्यों में यह काम नहीं हो सका है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में बच्चों की देखभाल करने वाले 7189 आश्रय गृह हैं। इनकी संख्या अधिक भी हो सकती है। हालांकि इनमें से सिर्फ 585० ही आश्रय गृह पंजीकृत हैं। इनमें करीब दो लाख 33 हजार बच्चे रहते हैं। इस समय जहां बिहार और उत्तर प्रदेश के आश्रय गृह लड़कियों के कथित रूप से यौन उत्पीडऩ की वजह से चर्चा में हैं तो दूसरे राज्यों में गैरकानूनी तरीके से बच्चों को गोद देने या उन्हें बेचने जैसे आरोपों की वजह से आश्रय गृह चर्चा में आ जाते हैं।
इनमें से अधिकांश आश्रय गृहों का संचालन गैर सरकारी संगठन कर रहे होते हैं और उन्हें इसके लिये सरकार से नियमित रूप से धन भी मिलता है। लेकिन इसके बावजूद कई संगठन अपने आश्रय गृहों में बच्चों और महिलाओ की सही संख्या और सरकार तथा दूसरे स्रोतों से मिले धन के उपयोग के बारे में सही जानकारी मुहैया नहीं कराते। लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के तत्वावधान में करीब तीन हजार ऐसे संस्थानों का ही त्वरित सोशल आडिट हो सका है।
ताजा घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में न्यायालय में सुनवाई के दौरान न्याय मित्र वकील अपर्णा भट ने साफ शब्दों में कहा कि शीर्ष अदालत के निर्णय के बावजूद बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्य तो सोशल आडिट के काम में सहयोग से ही इनकार कर रहे हैं। अपर्णा के इस कथन से इतना तो साफ है कि सोशल आडिट के लिये सहयोग नहीं करने वाले राज्यों में स्थित आश्रय गृहों में सब कुछ ठीक नहीं है। 2००7 में पहली बार तमिलनाडु के एक अनाथालय में बच्चों के यौन शोषण के बारे में प्रकाशित खबर का शीर्ष अदालत ने संज्ञान लिया था। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी मामले में किशोर न्याय कानून के तहत अनेक निर्देश दिये थे।
यह कितना हास्यास्पद है कि केन्द्र सरकार राज्यों को अपने यहां काम कर रही बाल गृह संस्थाओं का विवरण उपलब्ध कराने की हिदायत देती है और बिहार तथा तेलंगाना जैसे कुछ राज्य इसका विवरण भी उपलब्ध नहीं कराते। यदि हम इन आश्रय गृहों के प्रति गंभीर हैं तो इन मामलों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की जवाबदेही निर्धारित होना बेहद जरूरी है।

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