समावेशी छवि से हासिल नायकत्व

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एच. के. दुआ
अटल जी के निधन से देश ने न केवल भाजपा का पहला प्रधानमंत्री खोया है बल्कि ऐसा राष्ट्रीय नेता, जिसने दशकों तक महान राजनेता वाली राष्ट्रीय छवि अर्जित की थी। उनका राजनीतिक संबंध भले ही एक दल विशेष से था लेकिन उनका विश्वास था कि भिन्नता से परिपूर्ण भारतवर्ष में जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा रूपी जो विभिन्नताएं हैं, उनसे ऊपर उठकर राष्ट्रीय सहमति बनाई जाए। उनका विश्वास लोकतंत्र, मीडिया की स्वतंत्रता, मतभेद का हक और संवैधानिक संस्थानों के प्रति आदर और सहिष्णुता में था।
अटल जी का संसदीय सफर लोकतंत्र की स्थापना के आरंभिक वर्षों से हुआ, कई बार चुनावी शिकस्त पाई लेकिन जल्द ही ओजस्वी भाषणों की झड़ी लगाने के लिए सदन में वापसी की, जिनसे जवाहरलाल नेहरू खासे प्रभावित रहे। उन्होंने अटल जी से एक बार कहा, ‘एक न एक दिन आप देश के प्रधानमंत्री होंगे।Ó
यहां तक कि भाजपा और जनसंघ को लेकर सशंकित रहने वाले मुस्लिमों ने भी अटल जी और उनकी संजीदगी पर भरोसा रखना शुरू कर दिया था। यह संघ परिवार के साथ पले-बढ़े नेता के लिए कोई कम उपलब्धि नहीं थी। बतौर प्रधानमंत्री वे भारत को दुनिया के अग्रणी देशों में देखना चाहते थे लेकिन उनका ध्यान पाकिस्तान, चीन और अमेरिका से संबंध सुधारने पर भी था। वे पाक से दोस्ताना संबंध बनाने हेतु बस द्वारा लाहौर गए थे। यहां तक कि ‘निशान-ए-पाकिस्तानÓ जाना यह दर्शाने के लिए था कि भारत खुद पाकिस्तान का वजूद चाहता है। यह बात भाजपा के अखंड भारत वाले ध्येय से एकदम विपरीत थी। चूंकि भाजपा और संघ को पता था कि वाजपेयी जी ही सत्ता में बने रहने के लिये पार्टी का चेहरा हैं।
दुनिया ने एक महान राजनेता उन्हें तब माना जब कारगिल युद्ध की कटु यादों के बावजूद अटल जी ने जनरल मुशर्रफ के साथ वार्ता की राह चुनी। वे शांति के इच्छुक थे लेकिन मुशर्रफ की गैर वाजिब मांगों को मानने से उन्हें गुरेज था। वाजपेयी जी के साथ निजी बातचीत में मैंने एक बार उनसे पूछा , ‘पाक के साथ संबंध बनाने के लिए आप इतना संजीदा क्यों हैं जबकि भाजपा के विचार एकदम अलग हैं?Ó इस पर उन्होंने कहा था, ‘मैं यह इसलिए भी करना चाहता हूं क्योंकि मेरे बाद पार्टी में पाक के साथ शांति बनाना कोई भी नहीं चाहेगा।Ó
इसी जज्बे के साथ वे घाटी में जारी हिंसा का अंत करने के लिये कश्मीरियों से बातचीत के इच्छुक थे। फारूख अब्दुल्ला ने प्रधानमंत्री की पहलगाम यात्रा के बाद प्रेस वार्ता आयोजित की थी, जहां एक दिन पहले जघन्य हत्याकांड हुआ था। इस कानफ्रेंस से पहले अटल जी ने मेरे से पूछा था, ‘वे मुझसे कौन-कौन से सवाल पूछ सकते हैं?Ó मैंने कहा, ‘वैसे तो बाकी सभी सवाल बहुत सरल होंगे लेकिन एक कुछ टेढ़ा होगा जब पूछा जाएगा कि हुर्रियत और अन्य संगठनों के साथ वार्ता करने का जो वादा आपने किया था, क्या वह भारत के संविधान के अंतर्गत रहकर होगी या इससे इतर?Ó जाहिर है प्रेस वार्ता में यह सवाल आना ही था, जिसका संचालन मैं कर रहा था। एक पत्रकार ने पूछ ही लिया, ‘प्रधानमंत्रीजी जिस वार्ता का आपने वादा किया है, वह भारतीय संविधान के दायरे में होगी या इससे बाहर?Ó इस पर अटल का त्वरित जवाब था, ‘बातचीत इंसानियत के दायरे में होगी।Ó उत्तर सीधे उनके दिल से आया था। घाटी में वे इस जवाब के लिए आज भी जाने जाते हैं।
आर्थिक मोर्चे पर उन्होंने अपने कैबिनैट सहयोगियों को आजादी दी ताकि वे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान वर्ष 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा आरंभ की गई आर्थिक सुधार नीति पर अमल जारी रख सकें। वाजपेयी जी के राज में सकल आर्थिक वृद्धि दर दुनिया को हैरान करने वाली 9 फीसदी से ऊपर थी। बहुत सालों तक वाजपेयी जी ने संघ से दूरी बनाए रखी। जहां सरसंघचालक रज्जू भैया के साथ उनकी पटरी मेल खाती रही वहीं अगले सर्वेसर्वा सुदर्शन के साथ वैसा व्यावहारिक समीकरण नहीं बना पाए। एक बार एक मध्यस्थ ने प्रधानमंत्री वाजपेयी और सरसंघचालक सुदर्शन के बीच प्रधानमंत्री निवास पर रात्रिभोज मुलाकात आयोजित की थी। उन्होंने इक_े कुछ खाया तो जरूर था, लेकिन वाजपेयी जी ने पाया कि आरएसएस प्रमुख उस दिन उपवास पर थे!

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