बारिश और बाढ़ से तबाही और सबक

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केरल में मूसलाधार बारिश और बाढ़ से हुई भयंकर तबाही ने पूरे देश को चिंतित कर दिया है। केरल जैसे राज्य में इस तरह की बारिश और बाढ़ एक असाधारण घटना है। पिछले कई दशकों से लोगों ने वहां बाढ़ की बात भी नहीं सुनी थी। हां, 94 साल पहले जरूर बाढ़ और बारिश से कुछ इसी तरह की तबाही हुई थी।
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस बार केरल के काफी बड़े क्षेत्र में चक्रवाती सर्कुलेशन की स्थिति बनी हुई थी। फिर बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में कम दबाव का क्षेत्र होने से मॉनसूनी हवाएं बजाय आगे बढऩे के केरल में रुकी रहीं और वहां बारिश करने लगीं। इसके अलावा कर्नाटक और केरल में समुद्रीय ज्वार-भाटे की स्थिति ने भी इसमें इजाफे का काम किया। इस तरह केरल में इस बार 37 फीसदी ज्यादा बरसात हुई।
कई दिनों की लगातार बारिश से भयंकर बाढ़ आ गई जिसमें तीन सौ से भी ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं। लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। आपदा की इस स्थिति में केरल के साथ पूरे देश को खड़ा होने की जरूरत है। वहां जो ढांचा तहस-नहस हो चुका है, उसे फिर से खड़ा करने के लिए काफी संसाधनों की जरूरत पड़ेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाढ़ की विभीषिका की समीक्षा करने के बाद केरल को तत्काल 5०० करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है। कई राज्य सरकारों ने भी आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। कई अन्य संस्थाएं भी मदद के लिए आगे आई हैं। देश के नागरिक भी अगर अपने स्तर से योगदान कर सकें तो यह केरल के लोगों के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
असल चुनौती बाढ़ के बाद आने वाली है। जब पानी उतरता है तो कई तरह की बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है। लोगों को उनसे बचाना होगा। केरल की बाढ़ एक चेतावनी है। पिछले कुछ समय से मौसम का समीकरण लगातार बदल रहा है। कहीं अचानक बहुत ज्यादा बारिश हो जा रही है तो कहीं सूखा पड़ जा रहा है। मौसम के बदलते मिजाज से निपटने के लिए अभी भी हमारे पास पर्याप्त तैयारी नहीं है। हम तभी तत्पर होते हैं, जब पानी सिर से ऊपर आ जाता है। अचानक आई आपदा से तुरंत निपटने के लिए हमारे पास तैयारी नहीं रहती। अब हमें यह मानकर चलना होगा कि कहीं भी किसी भी परिस्थिति में कुदरत का कहर टूट सकता है। इसलिए हमें हर समय सचेत रहना होगा। इसके लिए सामाजिक-आर्थिक स्तर पर कई तरह के बदलाव करने होंगे, जीवन का तौर-तरीका बदलना होगा। जैसे महानगरों में अंधाधुंध विकास कार्य के चलने से जल निकासी के रास्ते बंद हो गए हैं। उन्हें पुनर्जीवित करने की जरूरत है। इसके लिए निर्माण कार्यों को लेकर कई तरह के नियम बनाने होंगे और बंदिशें लगानी पड़ेंगी। (आरएनएस)

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