अटल सत्य : शून्य भरना न होगा संभव

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उन्हें भारत रत्न तो बहुत बाद में मिला, लेकिन वे वाकई भारत रत्न थे। आज जब हमारे बीच अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं तो लगता है भारतीय राजनीति के आकाश में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। ओजस्वी वक्ता, प्रखर विचारक, कवि हृदय और सादगी से जीवन जीने वाले अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिक शुचिता के पक्षधर थे। धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा वाले राजनीतिक दल में शिखर तक पहुंचाने में उनका समावेशी व्यक्तित्व ही सहायक था। सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक जीवन में इसी सोच के चलते वे सामंजस्य बना पाये। उनकी उदारवादी छवि राजनीतिक दुराग्रहों के बावजूद बाधित नहीं हुई। ओजस्वी वक्ता व तार्किक क्षमता के कारण पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कह दिया था कि वे एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। अटल जी के व्यक्तित्व की एक खासियत यह रही कि भले ही वे किसी राजनेता के मुखर आलोचक रहे हों, मगर उनके गुणों को स्वीकारते रहे हैं। पं. नेहरू की नीतियों की मुद्दों पर आलोचना करने वाले अटल जी ने उनके जाने पर कहा था कि सूर्य चला गया, हमें तारों की छाया में राहें तलाशनी होंगी। लगता है मौजूदा वक्त में भारत के राजनीतिक आकाश में फिर एक सूर्य चला गया है, हमें तारों की रोशनी में आगे की दिशा तय करनी होगी।
नि:संदेह लंबी अस्वस्थता के चलते अटल जी की राजनीतिक सक्रियता लगभग शून्य ही हो गई थी। वे देश में भाजपा के उफान के वक्त मौन नजर आये। हालांकि ये भाजपा के उदय व उनकी रीतियों-नीतियों से बिलकुल भिन्न था, मगर इसकी बुनियाद में अटल-आडवाणी द्वारा खड़ी की गई बुनियाद का ही दमखम था, जो आज भाजपा के कंगूरे चमक रहे हैं। उनकी कश्मीर नीति और पाकिस्तान से संबंध सुधारने के प्रयासों को आज भी याद किया जाता है। कश्मीर के तमाम राजनीतिक दल और अलगाववादी नेता आज भी अटल जी की नीतियों में कश्मीर समस्या का समाधान देखते हैं। हिंदी भाषा के प्रति उनके अनुराग को पूरी दुनिया ने देखा था जब उन्होंने पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण दिया था। राजनीतिक जीवन में शुचिता के पक्षधर अटल जी की स्वीकार्यता का आलम यह था कि जब वे एक बार लोकसभा का चुनाव हारे तो सदन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा?था कि अटल के बिना सदन सूना लगता है। वे फिर राज्यसभा के जरिये संसद में पहुंचे। आज उनके जाने से देश का कोना-कोना सूना है।(आरएनएस)

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