जम्मू-कश्मीर में 51 साल बाद कोई राजनेता बना राज्यपाल

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नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर के नए राज्यपाल सत्यपाल मलिक राज्य में इस पद पर पिछले ५१ साल में नियुक्त किए जाने वाले प्रथम राजनीतिज्ञ होंगे। यह नियुक्ति केंद्र के इस संकटग्रस्त राज्य में पूर्व अधिकारियों पर अब तक निर्भर रहने की रणनीति में एक बदलाव का संकेत दे रही है। उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाने के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। पीडीपी के बागियों को मिलाकर बीजेपी की सरकार बनाने की कोशिशें अब तेज हो सकती हैं।
बीजेपी के सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार चाहती है कि जम्मू-कश्मीर में ब्यूरोक्रेट या रिटायर्ड जनरल की बजाए किसी राजनेता को भेजा जाए, जो वहां की जनता से जुड़ सके। सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल के लिए दो और पूर्व मुख्यमंत्रियों के नामों पर भी विचार किया गया, लेकिन अंत में मलिक का नाम फाइनल किया गया।
जेडीयू के एक नेता के मुताबिक, मलिक जम्मू-कश्मीर के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद के करीबी थे। सईद के साथ वह जनता दल में रहे थे। मलिक के करीबी सूत्रों के मुताबिक उन्होंने बिहार में राज्यपाल रहने के दौरान उन्होंने बी। एड। संस्थानों के साथ ही विश्वविद्यालयों में सुधार लाने के कई कदम उठाए। उन्होंने मुजफ्फरपुर कांड के बाद बिहार के सीएम नीतीश कुमार को सख्त चिट्ठी भी लिखी थी और फास्ट-ट्रैक कोर्ट में इसकी जल्द सुनवाई करने की मांग की थी।
कर्ण सिंह के बाद वह पिछले ५१ साल में जम्मू कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त होने वाले प्रथम राजनीतिक नेता होंगे। सिंह का कार्यकाल १९६७ में समाप्त हुआ था। एनएन वोहरा एक दशक से ज्यादा समय तक यहां के राज्यपाल रहे। अमरनाथ यात्रा को देखते हुए उन्हें कार्य विस्तार दिया गया था।
बदलते राजनीतिक परिदृश्य के आलोक में भी उनकी नियुक्ति को देखा जा सकता है। दरअसल, यह चर्चा है कि पीडीपी के असंतुष्ट विधायक भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। मलिक को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल ऐसे समय में बनाया गया है जब राज्य में अगले महीने स्थानीय निकायों में चुनाव होने हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय से आने वाले मलिक को रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद बिहार का राज्यपाल बनाया गया था। राज्यपाल बनने से पहले वह बीजेपी में किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे थे।
मलिक (७२) करीब-करीब सभी राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े रहे हैं। उन्होंने छात्र समाजवादी नेता के तौर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। पिछले साल बिहार का राज्यपाल नियुक्त किए जाने से पहले वह भाजपा के उपाध्यक्ष थे।
राममनोहर लोहिया से प्रेरित मलिक ने मेरठ यूनिवर्सिटी में एक छात्र नेता के तौर पर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। वह उत्तर प्रदेश के बागपत में १९७४ में चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल से विधायक चुने गए थे।
सत्यपाल मलिक १९८४ में कांग्रेस में शामिल हो गए और इसके राज्यसभा सदस्य भी बने लेकिन करीब तीन साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वह वीपी सिंह नीत जनता दल में १९८८ में शामिल हुए और १९८९ में अलीगढ़ से सांसद चुने गए।
साल २००४ में मलिक भाजपा में शामिल हुए थे और लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन इसमें उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह से शिकस्त का सामना करना पड़ा।
बिहार के राज्यपाल पद की चार अक्तूबर २०१७ को शपथ लेने से पहले वह भाजपा किसान मोर्चा के प्रभारी थे। वह २१ अप्रैल १९९० से १० नवंबर १९९० तक केंद्र में राज्य मंत्री भी रहे थे।

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