एक साथ चुनाव

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने लॉ कमिशन के सामने एक साथ चुनाव की वकालत जिस अंदाज में की है, उससे यह धारणा मजबूत हुई है कि मौजूदा सरकार ऐसा करने का मन बना चुकी है। अमित शाह ने लॉ कमिशन से कहा है कि यह सिर्फ एक अवधारणा नहीं बल्कि ऐसा सिद्धांत है जिसे अतीत में सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है और जिसे बिना किसी कठिनाई के लागू किया जा सकता है।
दिलचस्प बात है कि जिस दिन पार्टी अध्यक्ष ने लॉ कमिशन के सामने अपना पक्ष रखा, उसी दिन केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के साथ तीन अन्य बीजेपी नेता भी कमिशन के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान से इसी मसले पर मिले। इसी दिन सूत्रों के हवाले से मीडिया में यह खबर भी आई कि कैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाकर कुछ महीने चुनाव टाले जा सकते हैं ताकि कम से कम 11 विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ ही कराए जा सकें।
एक साथ चुनाव का विचार भले सबसे पहले चुनाव आयोग ने 1983 में व्यक्त किया हो और लॉ कमिशन ने 1999 में अपनी 17० वीं रिपोर्ट में इसे दोहराया हो, पर इसे अमल में लाने की चर्चा मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही शुरू हुई है। वह खुद एकाधिक मौकों पर बता चुके हैं कि यह विचार कितना अच्छा है और इसे अमल में लाना कितना फायदेमंद होगा।
हालांकि, अन्य प्रमुख दल उनकी राय से सहमत नहीं हैं। कई नेता इसे अलोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के खिलाफ बताते रहे हैं। यह भी कहा जाता रहा है कि इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत होगी जिसके लिए आवश्यक बहुमत सरकार के पास नहीं है। हालांकि बीजेपी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के हाव-भाव से ऐसा लगता है कि सरकार ने कोई ऐसी पतली गली खोज ली है, जिसके जरिए संविधान में संशोधन किए बगैर ही इसे अमल में लाना संभव हो सकता है। मगर संविधान में संशोधन की जरूरत पड़े या न पड़े, इतना बड़ा कदम संसद में बहस के बगैर उठाना उचित नहीं होगा। अगर सरकार इस राह जाने का मन बना चुकी है, तब भी संसद में खुली बहस के जरिये उसे पहले देश को इसके गुण-दोषों से अवगत कराना चाहिए।(आरएनएस)

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