उथल-पुथल का असर

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डॉलर के मुकाबले रुपये में आई भारी गिरावट का संबंध विश्व अर्थव्यवस्था की उथल-पुथल से है। सोमवार को रुपया डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर 69.62 पर पहुंच गया। कई विशेषज्ञ पहले ही आशंका जता चुके हैं कि यह 7० के स्तर से भी नीचे जा सकता है। इसका तात्कालिक कारण तेल आयातकों की ओर से डॉलर की डिमांड बढऩा है।
अगले महीने अमेरिका में एक बार फिर ब्याज दरें बढऩे की उम्मीद में डॉलर का लगातार मजबूत होना इसकी दूसरी वजह है। कुछ विशेषज्ञ गिरावट की एक बड़ी वजह तुर्की के मुद्रा संकट को भी मान रहे हैं। तुर्की की मुद्रा लिरा में सोमवार को 11 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई, जिससे दुनिया भर के बाजारों में खलबली मच गई। तुर्की इसके लिए अमेरिका को जवाबदेह मान रहा है।
तुर्की और अमेरिका के रिश्ते 1974 के बाद अभी सबसे बुरे दौर में है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तईप एर्दोआन ने इस संकट से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को खारिज किया और अमेरिका से साफ तौर पर कहा कि हम घुटने नहीं टेकेंगे, अगर आप डॉलर लेकर हमारे पास आओगे तो हम कारोबार करने का दूसरा तरीका खोज निकालेंगे।
तुर्की को दिए गए भारी कर्ज के कारण कुछ यूरोपीय बैंक भी इस संकट की चपेट में आ गए हैं। इसके चलते यूरोपीय करंसी यूरो के कमजोर पडऩे से भी डॉलर मजबूत हो रहा है। बहरहाल, रुपये में गिरावट का भारत पर नकारात्मक असर पडऩा तय है। इससे पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स का आयात महंगा हो जाएगा।
भारत अपनी जरूरत का करीब 8० फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। भारतीय तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा सकती हैं। इसके चलते माल ढुलाई बढ़ी तो महंगाई की रफ्तार और तेज हो सकती है। भारत बड़े पैमाने पर खाद्य तेलों और दालों का भी आयात करता है इसलिए इनकी कीमतें भी बढ़ सकती हैं। रुपया कमजोर होने से विदेश यात्रा महंगी भी होगी।
बहरहाल, रुपये की कमजोरी से सिर्फ नुकसान ही नहीं होता, कुछ क्षेत्रों को फायदा भी होता है। मसलन, आईटी, फॉर्मा और ऑटोमोबाइल सेक्टर को, क्योंकि इनकी कमाई एक्सपोर्ट बेस्ड होती है। इसके अलावा खासकर अफ्रीकी मुल्कों को डॉलर में फ्यूल बेचने वाली भारतीय तेल कंपनियों को भी फायदा होगा। अपना कच्चा माल बाहर से मंगाने वाली निर्यात कंपनियों का मुनाफा कुछ कम भी हो सकता है। रिजर्व बैंक को ऐसे में सुरक्षात्मक उपाय करने होंगे। रुपये को 7० के स्तर पर पहुंचने से रोकना उसकी पहली चुनौती होगी। यह सब तो होगा ही, लेकिन सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि दुनिया की प्रमुख व्यापारिक शक्तियां आपसी समझदारी बढ़ाएं और सहयोग का रवैया अपनाएं। ट्रेड वॉर के साथ ही अगर करंसी वॉर भी चल पड़ा तो इसके घाव सबको झेलने होंगे।(आरएनएस)

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