अमेरिकी-रूसी तकरार में चीन को फायदा

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जी. पार्थसारथी
अमेरिकी लोग उन आरोपों को लेकर गुस्से से उबल रहे हैं, जिसमें कहा गया था कि वर्ष 2०16 के राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने अपरोक्ष दखलअंदाजी की है और जिसकी वजह से डोनाल्ड ट्रंप की जीत आसान हुई थी। रूस के इस कथित कृत्य को हवा देने में राष्ट्रपति ट्रंप खुद सीधे या अपरोक्ष रूप से शामिल थे या नहीं, इसको लेकर संशय, बहस, विचार बना हुआ है। यहां तक कि कानूनी कार्रवाई करने की बात कही जा रही है। लेकिन असल में क्या हुआ है, इसको लेकर जिस तरह की नैतिक शुचिता का इजहार किया जा रहा है, उससे किसी को भी हैरानी हो सकती है। सबको यह मालूम है कि रूसी और अमेरिकियों को भारत समेत दूसरे मुल्कों के आंतरिक मामलों में, खासकर शीत युद्ध के दौरान, दखल देने से कभी गुरेज नहीं रहा है।
बृहद परिदृश्य के अनुसार देखें तो यह भारत के हित में नहीं है कि रूस और अमेरिकी लगातार एक-दूसरे का विरोध करने वाले तेवर में रहें। हावी होने और दावेदारी जताने को उतारू चीन के उद्भव के साथ, जिसमें वह अपने साथ लगते सागरीय क्षेत्र में सीमा संबंधी विवादों में दबंगता दिखा रहा है, इसके मद्देनजर भारत के सामने वह स्थिति है जहां रूस के प्रति अमेरिका के कड़े रुख की वजह से रूसियों और चीनियों में गठबंधन का सबब पैदा हो गया है। यह परिस्थिति मोटे तौर पर इसलिए भी बनी क्योंकि बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति काल में अमेरिकी सरकार ने गलत आकलन करते हुए यह मान लिया था कि सोवियत संघ के पतन के बाद वाली दुनिया में वह रूस को एक हारे हुए देश की तरह लेकर बर्ताव कर सकेगा। क्लिंटन की कोशिश रूस को नाथने की थी और वे पूर्व सोवियत संघ के सदस्य रहे देशों के बहुत बड़े थलीय और समुद्री इलाकों पर परंपरागत रूसी प्रभाव को नजरअंदाज कर रहे थे, जबकि आज भी उक्त इलाकों में बड़ी संख्या में रूसी भाषी लोग बसते हैं।
हर किसी को उम्मीद थी कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका रूस के प्रभाव वाले आसपास के क्षेत्रों के अंदर दखलअंदाजी नहीं करेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अमेरिका ने न केवल नाटो संगठन के विस्तार हेतु सोवियत संघ से अलहदा हुए पूर्वी यूरोप के मुल्कों पर डोरे डालने शुरू कर दिए बल्कि ऐसी नीतियां अपनाईं, जिसकी वजह से रूस और इसके यूरेशियाई पड़ोसी मुल्कों के मध्य तनाव पैदा हुए बिना न रहे। रूस के मुस्लिम बहुल कॉकेशियन क्षेत्र में पृथकतावाद को हवा देने हेतु अमेरिका और उसके यूरोपियन सहयोगियों ने कोई उपाय बाकी नहीं रख छोड़ा। इन दोनों ने मिलकर चेचन्या में पृथकतावाद और हिंसा को भड़काया। स्थिति तब ज्यादा बिगड़ गई जब बेल्सन के विद्यालय में सशस्त्र चेचन आतंकवादियों ने अचानक हमला कर वहां लोगों को बंधक बना लिया था और 3०० से ज्यादा बच्चों की नृशंस हत्या कर दी थी। इससे गुस्साए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने निकट सहयोगियों को बताया कि केस्पियन सागर क्षेत्र में रूसी ताकत को निरस्त करने हेतु वहां दुनिया की मुख्य ताकतें शामिल हैं। चेचन विद्रोहियों के पाकिस्तान के साथ भी खासे संबंध हैं, खासकर आईएसआई की शह प्राप्त इस्लामिक आतंकी संगठनों और अफगान तालिबान के साथ।
सोवियत संघ के विघटन के बाद वाले पहले सालों में इसकी सेना असफल सैनिक विद्रोह की वजह से अपनी साख गंवा बैठी थी। इसी बीच देश की आर्थिक स्थिति दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई थी। इस स्थिति से उबरने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज दिलवाने की क्लिंटन की ‘दरियादिल पेशकशÓ के सामने कभी कभार संजीदा होने वाले बोरिस येल्तसिन गिर गए थे। इस धन का उपयोग येल्तसिन को दुबारा चुनने के काम में उदारतापूर्वक हुआ था! रूसी विदेश मंत्री कोझेरेव को डूमा नामक रूसी पंचाट ने देश के सुरक्षा संबंधी हितों को पश्चिमी हितों के सामने जानबूझकर कमजोर करने की एवज में निकाल बाहर किया था। कोझारेव के बाद इस पद पर येवगेनी प्रीमाकोव आए (जो पिछले कुछ सालों से मियामी में किसी निजी व्यवसाय में लिप्त हैं)। अफगानिस्तान को लेकर कोझेरेव के कुछ फैसलों से नरसिम्हा राव की सरकार को भी झटके लगे थे।

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