कांवड़ यात्रा के नाम पर

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सावन शिवरात्रि के साथ ही गुरुवार को कांवड़ यात्रा का समापन हो गया, लेकिन इस बार की कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति आस्था प्रदर्शित करने निकले श्रद्धालुओं के अलावा इसमें शामिल असामाजिक तत्वों की अशोभनीय हरकतों के लिए भी याद की जाएगी। कांवड़ यात्रा के दौरान अप्रिय घटनाओं की छिटपुट खबरें हर साल आती हैं, मगर इस बार इसका पैमाना बहुत ज्यादा बढ़ गया। दिल्ली में जिस तरह कांवडिय़ों ने बीच सड़क पर उत्पात मचाया और एक कार को तबाह कर दिया, उसे मामूली घटना कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
यूपी के बुलंदशहर में 7 अगस्त को हुई घटना भी कम हैरत में डालने वाली नहीं है, जहां उनका निशाना एक पुलिस जीप बनी। इन दोनों घटनाओं का विडियो देख कर यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कांवडिय़ों के वेश में ये लोग सामान्य श्रद्धालु ही थे, या दबंगों का कोई गुट सड़क पर अपनी दादागिरी दिखा रहा था। इस संदर्भ में घटनाओं को लेकर पुलिस के नजरिये पर अलग से बात होनी चाहिए। अभी कुछ दिन पहले यूपी पुलिस के एक बड़े अधिकारी हेलिकॉप्टर से कांवडिय़ों पर फूल बरसाते देखे गए थे। इसमें शक नहीं कि भारत में हर पंथ के लोगों को अपने धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं के अनुरूप जीवन बिताने की पूरी आजादी है, लेकिन कानून व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों का काम इन अलग-अलग आस्थाओं का हिस्सा बनना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ये आस्थाएं न तो आपस में टकराएं, न ही अन्य नागरिकों के अधिकारों को मटियामेट करें। दिल्ली में कांवडिय़े पुलिस की मौजूदगी में कार को तहस-नहस करते देखे गए, पर मामला अज्ञात कांवडिय़ों के खिलाफ दर्ज किया गया और मीडिया रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से ही बताया गया कि कार चला रही महिला ने एक कांवडिय़े को थप्पड़ मारा था। घटनास्थल पर मौजूद महिला की दोस्त इसे गलत बता रही है। अगर यह एक पक्ष की शिकायत है तो इसे तथ्य के बजाय शिकायत की तरह पेश किया जाना चाहिए। धार्मिक विश्वास और कानून पालन के दायित्व में घालमेल किया गया तो यह सबके लिए घातक होगा।(आरएनएस)

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