कैसी कितनी निगरानी

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केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया हब बनाने के फैसले से पीछे हटकर अच्छा किया। इस प्रस्तावित हब पर यह आरोप लग रहा था कि यह नागरिकों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने का हथियार बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सख्त रुख अपनाया था। 13 जुलाई को पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि यह ‘निगरानी राजÓ बनाने जैसा होगा। केंद्र ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि सोशल मीडिया हब बनाने के प्रस्ताव वाली अधिसूचना वापस ले ली गई है और सरकार अपनी सोशल मीडिया नीति की गहन समीक्षा करेगी।
पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया को लेकर पूरा देश और समाज दुविधा में है। यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि इसका किस रूप में इस्तेमाल किया जाए, इसे किस तरह नियंत्रित किया जाए। दरअसल, भारत जैसे देश में इसके एकदम दो छोर हैं। एक तरफ असामाजिक तत्वों द्वारा इसके जबर्दस्त दुरुपयोग की आशंका है। हमने देखा कि किस तरह हाल में कुछ वॉट्सऐप मेसेज कई लोगों की मौत का कारण बन गए। पहले गोरक्षा फिर बच्चा चोरी के नाम पर अनेक निर्दोष लोगों की हत्या हुई। लेकिन दूसरी ओर यह भी आशंका है कि इसके नियंत्रण के लिए बनाई जाने वाली कोई व्यवस्था कहीं सरकारी पक्ष के हित में न काम करने लग जाए। राजनीतिक तबके द्वारा अपने सियासी स्वार्थ के लिए इसके इस्तेमाल के उदाहरण भी हमारे सामने मौजूद हैं।
दोनों तरह की आशंकाओं का निवारण जरूरी है। लेकिन हमारा देश जनतंत्र के जिस मुकाम पर पहुंच चुका है वहां ऐसी किसी व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी जा सकती, जो किसी भी तरह से नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करती हो। इसलिए ऐसा रास्ता निकालना होगा जिस पर किसी भी पक्ष को ऐतराज न हो।
पिछले दिनों जब वॉट्सऐप के दुरुपयोग की चर्चा शुरू हुई तो वॉट्सऐप ने खुद ही इसे रोकने की कोशिश की। कंपनी ने ऐसी व्यवस्था की कि यूजर्स भारत में सिर्फ पांच लोगों को ही विडियो, फोटो शेयर कर सकें। जैसे ही पांच बार विडियो और फोटो शेयर किए जाएंगे, उसके बाद फॉरवर्ड ऑप्शन हटा लिया जाएगा। कुछ ऐसे ही और तकनीकी प्रयास किए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया एक नई तकनीक है, जिसके साथ रहने का सलीका हमें सीखना होगा। पूरी दुनिया इसके उपाय ढूंढने में लगी है। शुरू-शुरू में ऐसा और भी तकनीकों के साथ होता रहा है, लेकिन समाज ने अपने हित में उसके प्रयोग के कुछ मानदंड बनाए। भारत में समाज का स्वरूप एक जैसा नहीं है, न ही जागरूकता का एक स्तर है। यहां कई तरह के हित, कई तरह की संवेदनशीलताएं हैं, जो एक दूसरे से टकराती भी हैं। ऐेसे में हरेक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए सोशल मीडिया जैसे माध्यम में सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत हमेशा रहेगी। लेकिन इसका तरीका सर्वसम्मति से ही तय किया जाना चाहिए।(आरएनएस)

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