नेतृत्व के मुद्दे पर भ्रमित गठजोड़

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राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की दूसरी बैठक में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, बेरोजगारी और राफेल रक्षा सौदा मुख्य मुद्दे रहे। इसके साथ ही पार्टी ने निर्णय लिया कि छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनाव में पार्टी बिना मुख्यमंत्री घोषित किए ही चुनाव लड़ेगी। वैसे तो कार्यकारिणी की बैठक एक सामान्य बैठक जैसी ही निपट जाती, किंतु इस बैठक से एक दिन पूर्व राहुल गांधी ने मीडिया में जो घोषणा की, उसने इसे महत्वपूर्ण बना दिया। उन्होंने घोषणा की कि इन तीन राज्यों में आगामी आम चुनावों के लिए कांग्रेस अन्य दलों के साथ एक महागठबंधन की तैयारी कर रही है।
उनके अनुसार उन्होंने अभी इस मुद्दे में काफी सफलता प्राप्त कर ली है और बिहार एवं महाराष्ट्र में काफी हद तक विपक्षी एकता को एक स्वरूप प्रदान कर दिया है। उनके अनुसार मध्य प्रदेश के अलावा बाकी दो प्रदेशों में उन्हें काफी हद तक सफलता भी प्राप्त हो रही है। वैसे सत्तारूढ़ पार्टी अपनी एकपक्षीय राजनीति की वजह से अपने खास एजेंडे के चक्कर में 2०० लोकसभा सीटों वाले इन राज्यों में अपना जमीनी वजूद खोती नजर ?आ रही है। यहां पर मोदित्व इतना मुखर भी नहीं है। सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में तमाम दरारों, एक-दूसरे के खिलाफ दावों, प्रतिदावों और मोदी मैजिक के चमत्कारिक प्रभा क्षेत्र से जनता के मोहभंग जैसे एक सुर विपक्षी नारों के बावजूद विपक्ष की एकता का रास्ता इतना आसान भी नहीं है। इन सभी दलों के नेता नेतृत्व में अपना ही वर्चस्व चाहते हैं और विपक्ष की एकता की सारी जिम्मेदारी कांग्रेस को ही ढोनी पड़ रही है। उनके अन्य सहयोगी सिर्फ विपक्ष की एकता से लाभ उठाने की ही फिराक में हैं, न कि उसमें कोई सहयोग देने की इच्छा रखते हैं। इस भावना से शुरू किया गया कोई भी गठबंधन कितना सफल हो सकता है और कितना चल सकता है, यह एक यक्ष प्रश्न है। (आरएनएस)

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