लौहपुरुष सी मां

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पल्लवी सक्सेना
मां क्या होती है, यह हम सभी जानते हैं, लेकिन जब तक वह हमारे साथ होती है, हमें उसके होने का एहसास नहीं होता, उसके होने की कद्र नहीं होती। फिर जब वह हमसे दूर चली जाती है तब हमें पता चलता है कि मां क्या होती है। यूं तो हर मां अपने बच्चों के साथ सदैव खड़ी रहती है लेकिन कुछ माएं ऐसी भी होती हैं जो समाज का डर दिखाकर चुप करा देना चाहती हैं। लेकिन मैं एक ऐसी मां से मिली जिसने अपने पति के रहते हुए भी अपने बच्चों का साथ कभी नहीं छोड़ा और पति के चले जाने के बाद भी। हर किसी के बस का नहीं होता यह काम, विशेष रूप से एक स्त्री के लिए तो बहुत ही मुश्किल है। लेकिन फिर भी उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया और उन्हें अपनी जि़ंदगी अपने तरीके से जीने की आज़ादी प्रदान की। समाज के तमाम तानों-बेतानों के बीच यदि एक लड़की की विधवा मां उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले तो उससे बड़ा आक्षेप तो इस समाज में कोई दूजा हो ही नहीं सकता। इसलिए अच्छी ख़ासी पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़की से कोई महज इसलिए शादी नहीं करना चाहता कि वह बहुत माडर्न है, सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखती है। क्यूं भाई? क्योंकि ऐसी लड़कियों आप दबा के नहीं रख सकते। उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार नहीं बना सकते। उसके मां-बाप से दहेज की मांग नहीं कर सकते। इसलिए ऐसी लड़कियां अच्छे घरों की बहू नहीं बन सकतीं।
बेटी की शादी सही समय पर न हो तो मां को चिंता तो हो ही जाती है। अचानक एक दिन खबर आती है, मेरी बेटी की शादी है आप सब ज़रूर आना तो लोग शादी में यह देखने पहुंचते हैं कि ऐसी लड़की के लिए लड़का मिला कहां से। बहू की कामना के लिए वही मां जब आलीशान घर बनवाती है। बेटे की नौकरी लगते ही उसे अकेले रहना होगा, यह सोचकर बहू के सपने लिए जब उसकी छोटी सी गृहस्थी सजाती है। बेटे की नौकरी ज्वाइन करते ही ऐसी बीमार पड़ती है कि एक छोटे से बुखार से कहानी शुरू होकर हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। सोचिए जऱा ऐसे में क्या गुजऱी होगी उन बच्चों पर जिनके पापा के जाने बाद उनकी मां ही उनके जीवन में एक लौहपुरुष की भूमिका निभाती है। उनकी फेसबुक प्रोफ़ाइल, उनके व्हाट्सएप नंबर में लगी उनकी तस्वीर जैसे यकीन करने ही नहीं देती कि अब वह हमारे बीच नहीं है। ‘चि_ी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए।’

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