वर्चस्व और दबाव

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अमेरिका ने ईरान पर मंगलवार को फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। इन प्रतिबंधों को कुछ साल पहले हुए ऐतिहासिक बहुपक्षीय परमाणु समझौते के बाद हटा लिया गया था। मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका के परमाणु समझौते से बाहर होने की घोषणा की थी। बीते सोमवार को जारी कार्यकारी आदेश में उन्होंने कहा कि मिसाइलों के विकास और खाड़ी क्षेत्र में घातक गतिविधियों के व्यापक और स्थायी समाधान की खातिर ईरान पर वित्तीय दबाव डाला गया है।
अमेरिकी प्रतिबंधों के पहले चरण में ईरान की अमेरिकी मुद्रा तक पहुंच घटाने के लिए कार और कालीन समेत उसके अन्य प्रमुख उद्योगों को निशाना बनाया गया है। हालांकि, प्रतिबंध का प्रभाव ईरान पर पहले से ही दिखने लगा है। ट्रंप द्वारा समझौते से बाहर निकलने की घोषणा के बाद से ही ईरानी मुद्रा रियाल का मूल्य गिरते हुए आधे पर आ गया है।
प्रतिबंध लगाए जाने पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने अमेरिका पर ईरान जैसे इस्लामिक देश के खिलाफ ‘मनोवैज्ञानिक युद्धÓ छेडऩे का आरोप लगाया। पिछले ही हफ्ते ट्रंप ने कहा था कि वह ईरान से बातचीत के लिए तैयार हैं। इस पर ईरान में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
ईरान के रेवलूशनेरी गार्ड के प्रमुख ने ट्रंप के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था कि ‘ईरान, उत्तर कोरिया नहीं है जो आपके बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले।Ó जाहिर है, ऐसे बयानों ने ट्रंप को बौखला दिया। उन्होंने ईरान पर फारस की खाड़ी में नौसेना अभ्यास करने का आरोप लगाया। अमेरिका और ईरान की यह तनातनी दुनिया के शक्ति समीकरण पर गहरा असर डाल सकती है।
दरअसल, अमेरिका 2०15 में सीरिया में लगे झटके को अब तक पचा नहीं पाया है। शायद वह ईरान को भी इराक बना देना चाहता हो, लेकिन यह आसान नहीं है। ईरान के प्रति ट्रंप के इस रवैये को इजरायल और सऊदी अरब जैसे अमेरिकी-खेमे के मुल्कों को छोड़कर किसी ने पसंद नहीं किया है। परमाणु समझौता तोडऩे को लेकर यूरोपीय संघ अपनी आपत्ति जता चुका है। जर्मनी का कहना है कि ‘ईरान के मुद्दे पर अमेरिका का व्यवहार हम यूरोपीय लोगों को रूस और चीन के अमेरिका विरोधी रुख के करीब ले जाएगा।Ó
ट्रंप के कदम ने ईरान में कट्टरपंथियों और रूहानी जैसे उदारवादियों को एक कर दिया है। वहां अमेरिका के खिलाफ तमाम शक्तियां एकजुट हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की इस जिद ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की उनकी क्षमता कमजोर की है। नॉर्थ कोरिया जैसा देश भी अब शायद ही उनकी बात मानेगा और कोई समझौता करेगा।
अमेरिकी प्रतिबंधों का दूसरा चरण 5 नवंबर से प्रभावी होगा और तब ईरान के कच्चे तेल की बिक्री पर रोक लगेगी। इससे तेल के दाम तो बढ़ेंगे ही, ईरान के चाहबहार बंदरगाह में भारत के निर्माण-कार्य पर भी बुरा असर पड़ेगा। जल्द ही हमें बहुत समझदारी से कुछ जरूरी फैसले लेने पड़ेंगे। (आरएनएस)

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