महंगाई से महायुद्ध

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महंगाई की बढ़ती आशंका को लेकर सतर्क भारतीय रिजर्व बैंक ने लगातार अपनी दूसरी मौद्रिक नीति में भी रीपो रेट ०.25 फीसदी बढ़ा दिया है। रीपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर तमाम भारतीय बैंक अपने कारोबार के लिए आरबीआई से रकम उठाते हैं। यह दर जून में 6 फीसदी से बढ़कर 6.25 फीसदी हुई थी और अभी वहां से चढ़कर 6.5 फीसदी हो गई है। अक्टूबर 2०13 के बाद पहली बार ही ऐसा हुआ है कि देश की यह मुख्य ब्याज दर लगातार दो मौद्रिक नीतियों में बढ़ाई गई है। रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को 4 फीसदी से ऊपर न जाने देने का लक्ष्य रखा है, लेकिन तमाम भीतरी-बाहरी वजहों से इस पर टिके रहना मुश्किल हो रहा है।
महंगाई लगातार बढ़ रही है और जून में ही यह 5 फीसदी के पार चली गई थी। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें इस साल लगभग 2० फीसदी बढ़ चुकी हैं। मई में तो क्रूड ऑयल 8० डॉलर प्रति बैरल के स्तर से भी ऊपर चला गया था, जो 2०14 के बाद से इसकी सबसे ऊंची कीमत है। इसके चलते केंद्र सरकार के आयात बिल में भारी इजाफा हुआ है।
रुपये का स्तर भी डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर चल रहा है। इस कैलेंडर वर्ष में रुपया 7 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है। 2० जुलाई को डॉलर के मुकाबले रुपया 69.13 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर चला आया था। इन दोनों वजहों से रिजर्व बैंक को आयातित महंगाई का डर सता रहा है। इस साल अच्छे मॉनसून की सूचना से महंगाई में राहत की उम्मीद की जाती रही है, लेकिन इस मामले में भी अभी तक के आंकड़े अधिक आशावादी होने की इजाजत नहीं देते। मौसम विभाग ने कई क्षेत्रों में जरूरत से कम या ज्यादा बारिश दर्ज करते हुए मॉनसून का पैटर्न असंतुलित रहने के संकेत दिए हैं। अब तक पूरे देश में सामान्य से 6 फीसदी कम बारिश हुई है और अगस्त में मॉनसून की चाल कमजोर रहने के अंदेशे से खरीफ के बूते महंगाई थामने की उम्मीद सुस्त पड़ी है।
सरकार ने खरीफ का एमएसपी बढ़ाकर किसानों की हौसलाअफजाई जरूर की है, लेकिन नतीजों के लिए अभी ढाई महीने इंतजार करना होगा। ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी से आम लोगों के साथ-साथ कॉर्पोरेट पर भी असर पड़ेगा। लोग बचत के लिए मन बनाएंगे, लेकिन होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई बढऩे से बिक्री के आंकड़े नीचे आएंगे। बैंकिंग सेक्टर के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कर्ज लेने की रफ्तार अभी धीमी है लिहाजा बैंकों का जोर कर्ज महंगा करने से ज्यादा अपना बिजनेस बढ़ाने पर होना चाहिए। लेकिन आम समझ यही कहती है कि मार्केट में कन्ज्यूमर ड्यूरेबल्स की बिक्री नरम पड़ सकती है और बैंकों से कर्ज उठाकर किए जाने वाले निजी निवेश में सुस्ती आ सकती है। बहरहाल, इस चुनावी साल में सरकार इकॉनमी में ज्यादा सुस्ती कतई नहीं चाहेगी, लिहाजा अपना निवेश उसे हर कीमत पर बढ़ाना होगा। (आरएनएस)

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