जीवन में विसंगतियों की लघुकथाएं

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कमलेश भारतीय
लघुकथा लोकप्रिय विधा है। नौवें दशक के बाद एक बार फिर इस विधा में रचनाकारों की सक्रियता बढ़ी है। एकल लघुकथा संग्रहों का प्रकाशन, लघुकथा सम्मेलन और विचार गोष्ठियों का सिलसिला तेज हुआ है। इसी धारा में घनश्याम मैथिल अमृत का लघुकथा संग्रह : एक लोहार की सामने आया है।
लघुकथा लेखन से पहले घनश्याम मैथिल क्षणिकाएं लिखते थे। क्षणिकाएं लघुकथा विधा का काव्यात्मक रूप मानी जा सकती हैं क्योंकि दोनों में थोड़े शब्दों में अपनी बात कहने की सामर्थ्य होनी चाहिए। घनश्याम मैथिल की लघुकथाएं सामाजिक सरोकार और कथनी व करनी के अंतर को पाठकों के सामने बखूबी रखती हैं। कुछ रचनाएं तो टीवी चैनल्स के समाचारों से प्रभावित होकर तुरत-फुरत रची गयी हैं और जैसे ही इन्हें पढ़ते हैं, वैसे ही ये समाचार भी मन में कौंध जाते हैं। कुछ भावों पर बार-बार लिखी गयी रचनाएं भी हैं : जैसे तिरंगे को लेकर। हर दल अपने झंडे को लेकर ही झगड़ रहा है जबकि देश का तिरंगा भूल गये हैं। जबकि तिरंगा है, देश है तभी तो हम हैं।
इसी तरह वृद्धावस्था को लेकर भी रचनाएं हैं। आश्रम में वृद्ध माता-पिता को छोडऩे और भावी पीढ़ी द्वारा वही व्यवहार किए जाने के खतरों की ओर संकेत किए हैं। रक्तदान को धर्म व जाति से ऊपर उठकर करने की भावना प्रदर्शित की गयी हैं। इसीलिए कौम की खातिर में रक्त की जरूरत को पीछे धकेल कर रक्त लेने से पिता मना करने देता हैं। ‘भोजन का धर्मÓ यह संकेत करती है कि जिनके पेट पहले से भरे हुए हैं, उन्हें खिलाने की बजाय सचमुच गरीब व जरूरतमंद को भोजन करवाया जाए। चूहे और आदमी, लक्ष्मी जी सदा सहाय, हरी झंडी का इंतजार, हिंदी प्राब्लम सर, डेथ सर्टिफिकेट जैसी लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। ‘गरीब की बेटीÓ यूपी के एक मंत्री की भैंस ढूंढऩे पर लिखी गयी है क्योंकि पुलिस गरीब की बेटी को खोजने की बजाय मंत्री की भैंस तलाश करने मे जुट जाती है।(आरएनएस)

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