सरकार के गले का फंदा बना अतिक्रमण

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देहरादून। राजधानी में अतिक्रमण के खिलाफ चल रहा अभियान अब सरकार के गले का फंदा बनता जा रहा है। व्यापारियों और दुकानदारों की नाराजगी झेल सरकार के सामने अब मलिन बस्तियों को खाली कराने की जो बड़ी चुनौती है उससे कैसे बचा जा सकता है? इस पर माथा पच्ची जारी है।
अदालत से सरकार को कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है हाईकोर्ट द्वारा जो चार सप्ताह का समय इस अभियान को पूरा करने को दिया गया था वह कल समाप्त होने जा रहा है सरकार 28 को अदालत में अपनी प्रगति रिपोर्ट देगी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मलिन बस्तियों में रहने वालों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में अपना पक्ष रखने को कहा जा रहा है अब तक 8000 लोगों को नोटिस मिल चुके हैं। नगर निगम के रिकार्ड के अनुसार दून में 129 मलिन बस्तियों के 4 हजार से अधिक घर इसके दायरे में हैं तथा 400 हेक्टेयर सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे हैं। जिसमें तीन लाख से अधिक लोग रह रहे हैं। निर्विरोध अतिक्रमण तभी हटाया जा सकता है जब इनके पुर्नवास की कोई व्यवस्था हो जो संभव नहीं है। कोर्ट के आदेश हैं इसलिए कार्यवाही भी जरूरी है और अगर कार्यवाही होती है तो इस आवादी का विरोध झेलना भी सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
शहरी विकास मंत्री से लेकर तमाम भाजपा विधायक इन बस्तियों में रहने वालों को भरोसा दिला रही है कि उनकी बस्तियों से अतिक्रमण नहीं हटाया जायेगा। लेकिन सवाल यह है कि सरकार के पास इसका समाधान क्या है? बीते कई दिनों से सरकार इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट जाने की बात कर रही है लेकिन अब तक गयी नहीं। सरकार क्या इन बस्तियों को बचाने के लिए कोई नया अध्यादेश लाने जा रही है? क्या कोर्ट के आदेशों के खिलाफ इस अतिक्रमण को न हटाने देने के बयान देने वाले नेता और कोर्ट की अवमानना नहीं कर रहे हैं। अगर कोर्ट जो सीभ तरह के अतिक्रमण को हटाने के आदेश दे चुका है अपने फैसले पर अडिग बनी रहता है। तब सरकार क्या करेगी?
सवाल बहुत सारे हैं बल्कि सवाल ही सवाल हैं। अगर इन मलिन बस्तियों से अतिक्रमण को नहीं हटाया जाना है, तो उन्हें नोटिस क्यों भेजे जा रहे हैं? लोग मांग कर रहे हैं कि पहले सरकारी भवनों को हटाओ इसके बाद हमारे घर तोड़ना। विधायक जिन्हें लग रहा है कि बस्तियों को उजाड़ तो उनका राजनीतिक कैरियर चौपट हो जायेगा इसलिए वह भी सकरार से गुहार लगा रहे हैं कि सरकार कुछ तो करो?

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