फिर नये मुद्दों की तलाश में केजरीवाल

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दिल्ली में अधिकारों को लेकर उपराज्यपाल (एलजी) अनिल बैजल और अरविंद केजरीवाल सरकार के बीच जारी जंग को लेकर सुप्रीमकोर्ट का फैसला आ जाने के बावजूद मामला नहीं सुलझा है। केजरीवाल सरकार ने अफसरों की सर्विस पर नियंत्रण के मामले में फिर से सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अब सर्विस के मामले में भी सुप्रीमकोर्ट का फैसला शीघ्र आ जाएगा, लेकिन दिल्ली में आम चर्चा है कि इसके बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि केजरीवाल शांत बैठ कर काम करने लगेंगे। वे फिर से किसी अन्य मुद्दे पर केंद्र सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लड़ते दिखेंगे।
सुप्रीमकोर्ट अपने ताजा फैसले में साफ कह चुका है कि भूमि, पब्लिक आर्डर और पुलिस को छोड़ कर बाकी सभी विषय दिल्ली सरकार के पास हैं। इसी आदेश को आधार बनाकर केजरीवाल सरकार अफसरों की सर्विस पर नियंत्रण चाहती है। दूसरी ओर एलजी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अक्तूबर 2०15 के आदेश का हवाला देकर दलील दे रहे हैं कि सर्विस उनके ही पास है। केजरीवाल सरकार की शिकायत है कि 2०15 में केंद्र सरकार ने इसी आदेश से सर्विस का अधिकार उससे छीना था और अब सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद भी एलजी यह अधिकार नहीं छोड़ रहे हैं।
केजरीवाल को भी केंद्र सरकार खासतौर पर मोदी से लड़ते दिखने के लिए हर दम एक मुद्दे की जरूरत है। इसी के सहारे वे दिल्ली और देशभर में उन सभी लोगों को अपने साथ लाने की कोशिश में हैं जो मोदी को पसंद नहीं करते। अब 2०19 में लोकसभा चुनाव और उसके कुछ समय बाद हरियाणा विधानसभा के चुनाव हैं। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी चुनाव लडऩे की तैयारी में है। इनके बाद दिल्ली में चुनाव हैं। इसलिए भी वे मोदी से भिडऩे के लिए हर समय तैयार दिखते हैं। वैसे एलजी भी आए दिन केजरीवाल सरकार के कामकाज में बेवजह हस्तक्षेप करते रहते हैं। इससे केजरीवाल भी यह संदेश देने में काफी हद तक सफल रहे हैं कि केंद्र सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही है।
दरअसल, दिल्ली में अधिकारों का यह विवाद प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के समय से ही रहा है। आजादी के बाद दिल्ली को सी ग्रेड के राज्य का दर्जा देने के साथ विधानसभा भी मिली थी। 27 मार्च 1952 को पहली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस चुनाव जीती थी। चौधरी ब्रह्म प्रकाश पहले मुख्यमंत्री बने। वे मात्र 34 साल में मुख्यमंत्री बन गए थे। कुछ समय बाद ही वे ज्यादा अधिकार दिए जाने की मांग को लेकर पं. नेहरू के पास चले जाते थे। इसी मुद्दे पर पं. नेहरू से उनकी अनबन हो गई। उन्हें हटाकर सरदार गुरुमुख निहाल सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया। प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में दिल्ली विधानसभा भंग कर दी गई। दिल्ली का सी ग्रेड के राज्य का दर्जा खत्म कर इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया। इसके बाद दिल्ली अफसरों के हवाले रही।
दिल्ली को लंबे समय बाद 1966 में महानगर परिषद का दर्जा दिया गया। 1967 में दिल्ली महानगर परिषद के चुनाव में भाजपा को विजय मिली और विजय कुमार मल्होत्रा इसके पहले मुख्य कार्यकारी पार्षद थे। इधर, दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की मांग होती रही। अंतत: 1991 में संविधान संशोधन कर दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित किया गया और उसे विधानसभा फिर से मिल गई। दिल्ली को दोबारा विधानसभा मिलने पर 1993 में चुनाव हुए। भाजपा के मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। केंद्र में कांग्रेस सरकार थी। इस सरकार के अंतिम दिनों में केंद्र में भाजपा सरकार आ गई। दूसरे चुनाव में कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। वाजपेयी ऐसे नेता नहीं थे कि वे दिल्ली जैसे छोटे राज्य के मुख्यमंत्री से टकराव मोल लेते। शीला दीक्षित भी अनुभवी नेता थीं। इसलिए शीला को केंद्र से भिडऩे की नौबत नहीं आई। बाद में केंद्र में भी 1० साल कांग्रेस की ही सरकार थी।
बहरहाल, अब सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि मंत्रिमंडल के सभी फैसलों से एलजी को अवश्य अवगत कराया जाना चाहिए, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इसमें एलजी की सहमति जरूरी है। एलजी चुनी सरकार की सलाह से काम करने के लिए बाध्य है। अब केजरीवाल की पार्टी दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग कर रही है। कभी भाजपा भी यही मांग करती थी लेकिन केंद्र में सरकार बनाने के बाद वह इस मुद्दे पर खामोश हो गई। इसलिए तय है कि केजरीवाल अन्य मुद्दों पर केंद्र सरकार से लोहा लेते दिखेंगे।

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