गड्ढों में जाती जान

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ऐसा कोई चुनाव नहीं गुजरता, जिसमें नेता हर तरफ चिकनी सड़कें बनवा देने का वादा न करते हों और ऐसा कोई साल नहीं बचता, जब सड़कों के गड्ढों से होने वाली मौतें उसी साल आतंकवाद और क्रॉस-बॉर्डर फायरिंग में हुई मौतों के आंकड़ों को पीछे न छोड़ती हों। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया था कि उन्होंने प्रदेश की सड़कों के 63 प्रतिशत गड्ढों को भर दिया है। अब उन्हीं की सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले साल सड़क के गड्ढों की वजह से होने वाली मौतों में यूपी पूरे देश में अव्वल है।
यहां कुल 987 लोगों की मौत गड्ढों में गिरकर हुई, जबकि आतंकवाद के चलते इसी साल पूरे देश में कुल 8०3 जानें गईं। यूपी के बाद हरियाणा और गुजरात ऐसी मौतों के मामले में क्रमश: दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। महाराष्ट्र में 2०17 में 726 लोगों की मौत इन गड्ढों में गिरकर हुई, जो साल 2०16 की के मुकाबले सीधे दोगुनी है। अभी इसी महीने, यानी जुलाई 2०18 में अकेले मुंबई में 6 लोगों की जान सड़क के गड्ढों की वजह से जा चुकी है, लेकिन राज्य के लोक निर्माण मंत्री चंद्रकांत पाटिल का कहना है कि सड़क पर लोगों की मौत सिर्फ गड्ढों की वजह से नहीं होती।
सभी प्रदेशों की सरकारों ने इस वजह से होने वाली मौतों का जो आंकड़ा केंद्र सरकार को भेजा है, वह बताता है कि साल 2०17 में इन गड्ढों ने कुल 3,597 लोगों को स्वर्गवासी बना दिया। वर्ष 2०16 में इस वजह से 2,324 लोगों की मौत हुई थी। साल दर साल बढ़ता यह तकलीफदेह आंकड़ा बताता है कि किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वरना वजह क्या है कि वर्ष 2०13 से ही सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टिट्यूट ने तीन मिनट में गड्ढा भरने वाली जो मशीन बना रखी है, वह अभी तक इस काम के लिए जिम्मेदार लोगों की पहुंच में ही नहीं आ सकी है।
इसका एक उत्तर भ्रष्टाचार हो सकता है, जिससे अपने यहां की सड़कें तो क्या कोना-कोना भरा पड़ा है। मोटर वीइकल ऐक्ट में संशोधन के लिए प्रस्तावित विधेयक में गड्ढों के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है, पर वह भी इन गड्ढों की ही तरह लंबे समय से संसद में लंबित है। (आरएनएस)

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