दीपा: मजबूत हौसलों की सुनहरी चाल

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अरुण नैथानी
लगभग दो साल अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं से दूर रहने की टीस को झेलते हुए दीपा कर्माकर ने सुनहरी छलांग लगाई तो पूरे भारत में नई उम्मीद जगी। रियो ओलंपिक में एक सेकेंड के चौथे हिस्से से पदक जीतने से वंचित रहने वाली दीपा कर्माकर को देशवासियों ने हमेशा विजेता जैसा ही सम्मान दिया। पूरे देश ने पलक-पांवड़े बिछाकर उनका स्वागत किया। उन पर इनामों की बरसात भी हुई।
बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली त्रिपुरा की दीपा का जीवन नियति की विसगंतियों से जूझता रहा है। रियो ओलंपिक के बाद लगी चोट ने दीपा को निराशा में डुबो दिया। दीपा ने कहा भी कि जब लोग कहते थे कि दीपा का खेल खत्म हो गया तो मैं रोती थी। मगर कर्माकर तो कर्म में विश्वास करती थी। उसने निरंतर अभ्यास जारी रखा। वह कुछ अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग नहीं ले सकी। राष्ट्रमंडल खेलों में भी वह चोट के बाद हुए आप्रेशन के चलते भाग नहीं ले सकी। मगर 8 जुलाई को तुर्की में हुई एफआईजी कलात्मक जिमनास्टिक्स विश्व चैलेंज कप की वाल्ट स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर दीपा एक बार फिर सुर्खियों की सरताज बन गई।
त्रिपुरा राज्य के अगरतला में 9 अगस्त, 1993 को जन्मी दीपा को खेल की दुनिया में उतरने की प्रेरणा पिता से मिली जो स्पोट्र्स अथॉरिटी में कोच थे। मगर दीपा के साथ विडंबना यह थी कि दीपा फ्लैट फीट थी, जिसे एक जिमनास्ट के लिये बाधा माना जाता है। इससे दीपा को उछाल लेने में परेशानी हो रही थी। इस समस्या से निजात पाना दीपा व उसके कोच विश्वेश्वर नंदी के लिये एक बड़ी चुनौती थी। श्रमसाध्य प्रयासों से इस समस्या पर काबू पाया जा सका।
उसने वर्ष 2००7 में जलपाईगुड़ी में संपन्न जूनियर नेशनल स्पर्धा जीती। तब से लेकर दीपा ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में तकरीबन अस्सी पदक जीते हैं, जिनमें सत्तर के करीब स्वर्ण हैं। वर्ष 2०16 के ओलंपिक में उसने भारत का प्रतिनिधित्व किया। पिछले पांच दशकों में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली वह पहली भारतीय महिला जिमनास्ट थी। उसने ओलंपिक खेलों के फाइनल में जगह बनाई मगर विडंबना ने यहां भी पीछा न छोड़ा और उसे सेकेंड के चौथे हिस्से से पदक गंवाना पड़ा। मगर फिर भी देश ने उसे सिर-आंखों पर बैठाया।
दरअसल, दीपा के खेल की एक विशिष्टता यह भी है कि वह दुनिया की उन चुनिंदा खिलाडिय़ों में से है, जिन्होंने प्रोदुनोवा वॉल्ट का सफल प्रदर्शन किया है। दुनिया के पांच जिमनास्ट ही इसमें सफलतापूर्वक प्रदर्शन कर चुके हैं। यही वजह है कि ओलंपिक में पदक से वंचित रहने के बावजूद दीपा ने लाखों लोगों का दिल जीता।
सही मायनो में वर्ल्ड चैलेंज कप जीतना दीपा कर्माकर का एक तरह से कमबैक टूर्नामेंट था जहां उसने सबको पछाड़कर सोने पर कब्जा किया। यह कारनामा करने वाली वह पहली भारतीय जिमनास्ट है। वह भी तब जब कयास लगाये जा रहे थे कि घुटने की चोट के बाद दीपा का खेल खत्म हो गया है। ऐसा सुनकर वह रोया करती थी मगर उसके कोच व फिजियो ने लगातार उसका मनोबल बढ़ाया, जिसकी वजह से वह शानदार वापसी करने में कामयाब हो पाई। वह कहती है कि एक दिन प्रोदुनोवा जंप जरूर करेगी। यह बात अलग है कि इसमें कुछ समय लग सकता है।
दरअसल, रियो ओलंपिक के बाद दीपा एंटीरियर क्रूसिएट लिगामेंट यानी एसीएल चोट से जूझ रही थी। इसके लिये उसने सर्जरी भी करवाई। इसी वजह से वह कुछ समय पहले गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भाग नहीं ले पाई। इसी तरह वह बीते साल विश्व चैंपियनशिप व एशियाई चैंपियनशिप में भाग नहीं ले पाई थी। उसे अब अगस्त में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में होने वाले एशियन गेम्स के लिये दस सदस्यीय भारतीय जिमनास्टिक टीम में शामिल किया गया है। जिसे दीपा ने अपना अगला लक्ष्य बनाया है। हालांकि, वहां उसे चीन, जापान व कोरिया की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। मगर प्रोदुनोवा वोल्ट में गुरुत्वाकर्षण को मात देने वाला प्रदर्शन करने वाली दीपा से भारत को बड़ी उम्मीदें हैं। उस दीपा से, जिसने भारतीय जिमनास्ट को दुनिया में खास पहचान दिलाई है।
निश्चित रूप से दीपा के पास वह मनोबल है, जिससे वह हर मुश्किल से पार पा सकती है। एक समय था कि निम्न मध्य वर्ग से आने वाली दीपा के पास पहली प्रतियोगिता में भाग लेने हेतु जूते और कॉस्ट्यूम खरीदने के लिये पैसे नहीं थे। उधार मांगा कॉस्ट्यूम उस पर फिट नहीं था। मगर आज मेहनत व लगन से वह भारत की गोल्डन गर्ल है। उसकी कामयाबी का असली सफर अब शुरू हुआ है।

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