सोशल मीडिया पर नजर

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देश में सोशल मीडिया के उपयोग और दुरुपयोग के एक से एक खतरनाक आयाम इतनी तेजी से सामने आ रहे हैं कि इस पर नजर रखने और उपद्रवी तत्वों के खिलाफ समय से कार्रवाई करने की जरूरत बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में अगर सरकार सोशल मीडिया पर जारी गतिविधियों पर निगरानी की कोई व्यवस्था कर रही है तो पहली नजर में इसे स्वाभाविक और उचित ही कहा जाएगा।
हालांकि इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्त टिप्पणी की, उसके पीछे छिपी चिंताओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने आशंका जताई कि हर वॉट्सऐप संदेश और ट्वीट की निगरानी कहीं इस देश को सर्विलांस स्टेट की ओर न ले जाए। बहरहाल, इस आशंका के बावजूद कोर्ट ने इस प्रक्रिया को रोकने की जरूरत नहीं समझी है और सरकार को नोटिस जारी करके उसका पक्ष जानना चाहा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस तथ्य से अवगत है कि देश में सोशल मीडिया, खासकर वॉट्सऐप संदेशों का दुरुपयोग कैसे खतरनाक हालात पैदा कर रहा है।
पहले गोरक्षा और फिर बच्चा चोरी के नाम पर कई निर्दोष लोग जान से हाथ धो चुके हैं। जाहिर है, सोशल मीडिया नाम का यह हथियार लोगों के हाथ में पहुंच चुका है और इसकी मारक क्षमता आने वाले दिनों में और बढऩी ही है। ऐसे में इसके दुरुपयोग को रोकने के इंतजाम तो हमें करने ही होंगे। दिक्कत यह है कि इस हथियार का इस्तेमाल असामाजिक तत्वों द्वारा किए जाने की जितनी आशंका है, उतना ही बड़ा खतरा राजनीतिक दलों द्वारा अपने संकीर्ण चुनावी हित में इसका अलोकतांत्रिक इस्तेमाल किए जाने का भी है।
स्वाभाविक है कि इसका ज्यादा फायदा सरकारी पार्टियां उठाएंगी। इसलिए यह डर भी है कि सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिए बनाई जा रही व्यवस्था सरकारी पक्ष को फायदा दिलाने में काम आ जाए। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अभी अदालत की और बाद में चुनाव आयोग की होगी। इसके अलावा नागरिकों की निजता के अधिकार का मसला भी खासा अहम है।
हमारे इस मूल अधिकार के अकारण उल्लंघन की इजाजत शासन को किसी भी सूरत में नहीं दी जा सकती। इन जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ाया जाए तो ऐसा उपाय खोजा जा सकता है जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। नजरदारी की प्रक्रिया पर राजनीतिक सर्वसम्मति बनाकर किसी खास राजनीतिक दल के अनुचित प्रभाव की आशंका घटाई जा सकती है। तेजी से वायरल हो रहा कोई कंटेंट रोका जाना चाहिए या नहीं, यह जिम्मा मैजिस्ट्रेट स्तर के किसी अधिकारी को सौंपा जा सकता है। संक्षेप में कहें तो निष्पक्षता और निजता को सुनिश्चित किया जा सके तो यह एक सही कदम साबित होगा। (आरएनएस)

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