प्रचण्ड बहुमत का साईड इफेक्ट, भाजपा विधायकों की नाराजगी

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देहरादून। भले ही त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह कुर्सी पर बने रहने, और सरकार चलाने के लिए बहुुमत के संख्यावल का कोई दबाव न सही लेकिन वह और उनकी पार्टी भारी बहुमत के दबाव को संभालने में नाकाम होते दिखाई दे रहे हैं।
यह प्रचण्ड का साईड इफेक्ट है कि अब भाजपा विधायकों की नाराजगी सार्वजनिक मंचों पर भी सामने आने लगी है। अपने क्षेत्रें में विकास कार्यों को लेकर और नौकरशाहों की मनमौजी को लेकर यह विधायक सार्वजनिक तौर पर अपनी पीड़ा को जाहिर करने लगे हैं और सीधे मुख्यमंत्री पर भी अपनी उपेक्षा का आरोप जड़ने लगे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार का असहज होना स्वाभाविक है। ताजा संजय गुप्ता प्रकरण उसका एक उदाहरण है जिसे लेकर भाजपा के अंदर घमासान मचा हुआ है। मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष को आज दिल्ली बुलाया जाना इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
भाजपा ने विगत विधानसभा चुनाव में 70 में से 57 सीटें जीतकर सत्ता संभाली थी। लेकिन मुख्यमंत्री सवा साल बाद भी कैबिनेट में खाली पडे़ दो मंत्री पदों को नहीं भर पाये हैं। वहीं निगम आयोग और प्राधिकरणों में अध्यक्ष और उपाध्यक्षों के खाली पडे़ पदों को भी नहीं भरा जा रहा है। जबकि दायित्व पाने के लिए भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं में भारी बेकली है। यह किसी की भी समझ के परे है कि आखिर मुख्यमंत्री की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह कैबिनेट में खाली पडे़ पदों को इतने समय में भी नहीं भर सके हैं।
भले ही भाजपा के विधायक खाली पडे़ मंत्री पदों व दायित्वों के बटवारे पर कुछ न बोलें लेकिन अन्य मुद्दों की आड़ में अब उन्होंने अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। कुछ लोगों को खास तवज्जो दिए जाने और कुछ की उपेक्षा किए जाने के साथ-साथ वह सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे हैं। भले ही भाजपा इन विधायक व नेताओं को अनुशासन का डण्डा दिखाकर चुप करा दिया जाता हो लेकिन इससे उनका आक्रोश और बढ़ रहा है। दरअसल इसके पीछे समन्वय की कमी और प्रचण्ड बहुमत का दंभ ही है। अभी बीते दिनों मुख्यमंत्री के दरबार में शिक्षिका उत्तरा के साथ अभद्रता का मामला सुर्खियों में रहा था। जिसमें सरकार और मुख्यमंत्री की खासी किरकिरी हुई थी।
जनता ने जितने बडे़ बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता में आने का अवसर दिया था उससे अधिक अपेक्षाएं भी स्वाभाविक थी। लेकिन सरकार के अब तक के कामकाज और कई निर्णयों पर लिए गए यूटर्न से यही प्रतीक होता है कि वह भारी बहुमत का बोझ नहीं संभाल पा रही है।

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